भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1363, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंअधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३३१
करता है, शरीरमें कान्ति, काम और पुष्टि करता है, वली और पलितरोग तथा बह- रेपनको नष्ट करता है एवं पुष्टिके देनेवाला, बलकारक, वीर्यवर्द्धक और पुत्रको उत्पन्न करनेवाला है। बीस प्रकारके प्रमेह, ग्यारह प्रकारके क्षय तथा साध्य अथवा असाध्य सोमरोगको यह रस तत्काल नाश करता है ॥ १००-२ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां रसायनाधिकारः ॥
अथ वाजीकरणाधिकारः ।
येन नारीषु सामर्थ्यं बाजिवल्लभते नरः ।
व्रजेच्चाप्यधिकं येन वाजीकरणमेव तत् ॥ १ ॥
जिस औषधिके द्वारा मनुष्य स्त्रियोंमें घोडेके समान रमण करनेकी सामर्थ्यको
पाता है और बार बार मैथुन करता है तथा जिसके द्वारा अधिक वीर्य उत्पन्न हों
उसको वाजीकरण कहते हैं ॥ १ ॥
चिन्तया जरया शुक्रं व्याधिभिः कर्मकर्षणात् ।
क्षयं गच्छत्यनशनात्स्त्रीणां चातिनिषेवणात् ॥ २ ॥
अधिक चिन्ता, बुढापा, रोग, दुःखदायी कर्म, लंघन और अधिक स्त्रीप्रसंग करना
इत्यादि कारणोंसे वीर्य नष्ट होजाता है ॥ २ ॥
अतिव्यवायशीलो यो न च वृष्यक्रियारतः ।
ध्वजभङ्गमवाप्नोति स शुक्रक्षयहेतुकम् ॥ ३ ॥
जो मनुष्य अधिकतर मैथुन करता है रसायन एवं वाजीकरण औषधि नहीं खाता है
तो वह अधिक वीर्यके क्षय होनेके कारण नपुंसकताको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
ग्लानिः कम्पोऽवसादस्तदनु च कृशता क्षीणता चेन्द्रियाणां
शोपोच्छ्वासोपदेशज्वरगुदजगदाः क्षीणता सर्वधातौ ।
जायन्ते दुर्निवाराः पवनपरिभवाः क्लीबता लिङ्गभङ्गो
वामा वश्यात्तियोगाद्व्रजत इह सदा वाजिकर्मच्युतस्य ॥४॥
अत्यन्त स्त्रीप्रसङ्ग करनेके कारण वीर्य नष्ट होजानेपर वाजीकरण औषधि सेवन
न करनेसे मनुष्यके शरीरमें ग्लानि, कम्प, खेद, दुर्बलता, इन्द्रियोंकी शिथिलता,
शोथ, उच्छ्वास, उपदंश, ज्वर, गुदाके रोग सम्पूर्ण धातुओंमें क्षीणता और दारुण
वातरोग तथा नपुंसकता और लिंगनाश प्रभृति विकार उत्पन्न होते हैं ॥ ४ ॥