भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३३३
वाजीकरण औषधियोंको सेवन करके दूध और शीतल जल पान करे, फिर कामदेवके बाणोंसे विद्ध और रसको जाननेवाली नवयौवना तथा प्रसन्न चित्तवाली सुन्दरीको कामी पुरुष आनन्दसे एक प्रहरतक भोगे । जब मैथुन करते २ ग्लानि उत्पन्न होजाय तब वह पुरुष स्त्रीके अङ्गपर अङ्ग रखकर शयन करे । इस प्रकार करनेसे धातुवैषम्य नहीं होता ॥ ११ ॥
सुरूपा यौवनस्था च लक्षणैर्यदि भूषिता ।
वयस्या शिक्षिता या च सा स्त्री वृष्यतमा मता १२॥
जो स्त्री सुन्दर, जवान, शुभलक्षण और आभूषणोंसे सुसज्जित, थोडी अवस्थावाली और सुशिक्षित होती है उसको वृष्यतमा कहते हैं ॥ १२ ॥
विलासिनामर्थवतां रूपयौवनशालिनाम् ।
नराणां बहुभार्याणां विधिर्वाजीकरो हितः ॥ १३ ॥
स्थविराणां रिरंसूनां स्त्रीणां वाल्लभ्यमिच्छताम् ।
योषित्प्रसङ्गात्क्षीणानां क्लीबानामल्परेतसाम् ॥ १४ ॥
हिता वाजीकरा योगाः प्रीणयन्ति बलप्रदाः ।
एतेऽपि पुष्टदेहानां सेव्याः कालाद्यपेक्षया ॥ १५ ॥
जो पुरुष विलासी, धनाढ्य, रूप तथा यौवनसे सम्पन्न और जो बहुतसी स्त्रियोंवाले हों उनको वाजीकरणविधि हितकारी है । एवं जो वृद्ध तथा स्त्रीके अभिलाषी, स्त्रियाक प्रिय होनेकी इच्छा करनेवाले, अधिक स्त्रीप्रसङ्गसे अथवा वीर्यके नष्ट होनेसे क्षीणदेहवाले, नपुंसक और अल्पवीर्यवाले जो पुरुष हैं उनको वाजीकरण प्रयोग विशेष हितकर, प्रीतिकर और बलप्रद होते हैं । हृष्टपुष्ट शरीरवाले मनुष्योंको भी ये वाजीकर प्रयोग देश, काल और मात्रानुसार सेवन करने चाहिये ॥१३-१५॥
घृतभृष्टमाषद्विदलं दुग्धसिद्धं च शर्कराविमिश्रम् ।
भुक्त्वा सदैव कुरुते तरुणीशतमैथुनं पुरुषः ॥ १६ ॥
उरदकी दालको घीमें भूनकर दूधमें पकाकर उसमें चीनी मिलाकर भक्षण करनेसे मनुष्य निरन्तर सौ स्त्रियोंके साथ प्रसङ्ग करनेको समर्थ होता है ॥ १६ ॥
शतावरीशृतं क्षीरं प्रपिबेत्सितया युतम् ।
रममाणस्य विरतिं मृदुतां याति नेन्द्रियम् ॥ १७ ॥