भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1375, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1375

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३४३

निवृत्ति होती है । इसपर वापचीके एक कर्ष चूर्णको आमलोंके रसमें मिलाकर अनुपान करे । यह हेमसुन्दरनामवाला रस है ॥७०॥७१॥

अनङ्गसुन्दररस ।

शुद्धसूतं समं गन्धं त्र्यहं कल्हारजैर्द्रवैः ।
मर्दितं वालुकायन्त्रे यामं सम्पुटके पचेत् ॥ ७२ ॥
रक्तागस्त्यद्रवैर्भाव्यं दिनमेकं सिताम्बुजैः ।
यथेष्टं भक्षयेच्चानु कामयेत्कामिनीशतम् ॥ ७३ ॥

शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको समान भाग लेकर लाल कमलके रसमें तीन दिनतक खरल करे । फिर वायुकायन्त्रमें रखकर एक प्रहरतक पुटपाक करे । पश्चात् लाल अगस्तियाके रसमें एक दिनतक भावना देकर प्रतिदिन इस रसको उचित मात्रासे मिश्रीके जलके साथ सेवन करे और यथेच्छ भोजन करे तो सौ स्त्रियोंको भोगनेकी शक्ति सम्पन्न होता है ॥७२॥७३॥

गन्धामृतरस ।

भस्मसूतं द्विधा गन्धं कन्यकाद्भिर्विमर्दयेत् ।
रुद्ध्वा लघुपुटे पाच्यमुद्धृत्य मधुसर्पिषा ॥ ७४ ॥
वल्लं खादेज्जरामृत्युं हन्ति गन्धामृतो रसः ।
समूलं भृङ्गराजं च छायाशुष्कं विचूर्णयेत् ॥ ७५ ॥
तत्समं त्रिफलाचूर्ण सर्वतुल्या सिता भवेत् ।
पलैकं भक्षयेच्चानु सेवनाच्च जरापहः ॥ ७६ ॥

रससिन्दूर एक तोला और शुद्ध गन्धक दो तोले इन दोनोंको एकत्र घीग्वारके रसके साथ खरलकर पश्चात् लघुपुटमें रखकर पकावे । जब अच्छे प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे । इस औषधिको प्रतिदिन दो रत्ती प्रमाण ले घी और शहदमें मिलाकर सेवन करे तो यह गन्धामृत रस वृद्धावस्था और मृत्युको नाश करता है । इस औषधको सेवन करनेके पश्चात् जडसहित भाँगरेको छायामें सुखाकर चूर्ण करले, फिर उस चूर्णके समान भाग त्रिफलेका चूर्ण और सब चूर्णके बराबर भाग मिश्री मिलाकर उसमेंसे चार तोले नित्य सेवन करें तो वृद्धता दूर होती है ॥७४-७६॥

सिद्धसूत ।

मुक्ताफलं शुद्धसूतं सुवर्णं रूप्यमेव च ।
यवक्षारं च तत्सर्वं तोलकैकं प्रकल्पयेत् ॥ ७७ ॥

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