भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1378, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1378

१३४६ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक प्रत्येक- एकएक तोला, निश्चन्द्र अभ्रक दो तोले, भीमसेनी कपूर और वङ्गभस्म प्रत्येकः एकएक तोला, ताँबेकी भस्म ६ माशे, लोहेकी भस्म एक कर्ष, पुराने विधारेके बीज, जीरा, विदारीकन्द, शतावर, तालमखाने, खिरैंटी, कौंछके बीज, अतीस, जावित्री, जायफल, लौंग, भाँगके बीज, सफेद राल और अजवायन इन सबको चार चार माशे ले एकत्र पीस लेवे । इस औषधिको प्रतिदिन दो दो रत्ती प्रमाण ले सुखोष्ण दूधके साथ सेवन करे ॥ ८९-९३ ॥

गृहे यस्य शतं नार्यो विद्यन्तेऽतिव्यवायिनः । न तस्य लिङ्गशैथिल्यमौषधस्यास्य सेवनात् ॥ ९४ ॥ न च शुक्रं क्षयं याति न बलं ह्रासतां व्रजेत् । कामरूपी भवेन्नित्यं वृद्धः षोडशवर्षवत् ॥ ९५ ॥ रसः श्रीमन्मथाभ्रोऽयं महेशेन प्रकाशितः । अस्य भक्षणमात्रेण काष्ठं जीर्यति तत्क्षणात् ॥ नाशयेद् ध्वजभङ्गादीन् रोगान् योगकृतानपि ॥ ९६ ॥

जिसके घरमें सौ स्त्रियें हों और जो अत्यन्त मैथुन करनेवाले हैं उनको यह रस सेवन करना चाहिये । इसके सेवनसे लिङ्ग कभी शिथिल नहीं होता, न वीर्य नष्ट होता है और न बलका ह्रास होता है । एवं मनुष्य कामदेवके समान रूपवान् और बुढा सोलह वर्षके युवाके समान होता है । इस श्रीमन्मथाभ्ररसको श्रीमहादेवने प्रकट किया है । इसको भक्षण करनेसे काष्ठभी जीर्ण होजाता है तथा ध्वजभङ्गादिरोग तत्क्षण नष्ट होते हैं ॥ ९४-९६ ॥

श्रीकामदेवरस ।

पारदं पलमेकं स्याद् द्विपलं शुद्धगन्धकम् । रक्तकार्पासतोयेन घृष्ट्वा काचस्य कुप्यतः ॥ ९७ ॥ निक्षिप्य टङ्कणेनैव मुखं तस्य निरोधयेत् । वालुकायन्त्रमध्यस्थं कुप्यं च कुरुते दृढम् ॥ ९८ ॥ अहोरात्रं पचेदग्नौ शास्त्रवित्कुशलो भिषक् । शीते चादाय पात्रस्थं कूपिकान्तरलम्बितम् ॥ ९९ ॥ दरदेन समं रक्तं सोज्ज्वलं भस्म यद्भवेत् । भक्षयेन्माषमेकं च घृतेन मधुना सह ॥ १०० ॥

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