भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता १३४७
पश्चाद् दुग्धं गुडं चाज्यं कृष्णेक्षुमपि शर्कराम् ।
द्राक्षाखर्जूरमधुकप्रभृतीनथ भक्षयेत् ॥ १ ॥
शुद्ध पारा चार तोले, शुद्ध गन्धक ८ तोले इन दोनोंको लाल कपासके रसमें खरल करके बोतलमें भरकर सुहागेसे उसके मुँहको बन्द कर देवे । फिर उस बोतलको वालुकायन्त्रमें रखकर शास्त्रवेत्ता वैद्य एक दिनरात्रितक अग्निमें पकावे । जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब उसको शीशीमेंसे निकाले । वह हिंगुलके समान लालरंगवाली और अति उज्ज्वल भस्म होगी । उस भस्मको प्रतिदिन एक एक माशा ले घी और शहदमें मिलाकर चाटे और पीछेसे दूध, गुड, घी, काली ईखका रस, चीनी, दाख, खजूर और मुलहठी आदि द्रव्योंका सेवन करे ॥ ९७-१०१ ॥
त्रिफला मधुना शान्तिं याति पित्तं चिरोद्भवम् ।
निर्गुण्डिकारसेनात्र दुर्वारा वातवेदना ॥ २ ॥
प्रशमं याति वेगेन नूतनं च वपुर्भवेत् ।
अर्द्धावर्त्तितदुग्धेन गृह्यते यद्ययं रसः ॥ ३ ॥
वन्ध्यापि च भवेत्येव जीववत्सा सुपुत्रिका ।
कामदेवमथो सूतं कामिनां कामदं सदा ॥
अस्य प्रसादतो बह्व्यो रम्यश्च रमते स्त्रियः ॥ ४ ॥
त्रिफलेके क्वाथ और शहदके साथ इस रसको खानेसे बहुत पुराना दुष्ट पित्त शान्त होता है । निर्गुण्डीके रसके साथ खानेसे दुष्टवातकी वेदना दूर होती है और शरीर नवीन हो जाता है । यदि इस रसको एक बारकी ब्याई हुई गौके अधओटे दूधके साथ सेवन करे तो वन्ध्यास्त्री भी जीवितवत्सा और सुयोग्य पुत्रवाली होती है । यह कामदेव रस कामी पुरुषोंको कामके देनेवाला है । इसके प्रसादसें निर्बल मनुष्यभी प्रबल और रमणीय होकर स्त्रियोंको भोगता है ॥ २-१०४ ॥
मकरध्वजरस ।
स्वर्णादष्टगुणं सूतं मर्दयेत्त्रिकगन्धकम् ।
रक्तकार्पासकुसुमैः कुमार्याद्भिर्विमर्दयेत् ॥ ५ ॥
शुष्कं काचघटीं रुद्ध्वा वालुकायन्त्रगं हठात् ।
भस्म कुर्याद्रसेन्द्रस्य नवार्ककिरणोपमम् ॥ ६ ॥