भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३४८ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरण
भागोऽस्य भागाश्चत्वारः कर्पूरस्य सुशोभनाः । लवङ्गं मरिचं जातीफलं कर्पूरमात्रया ॥ ७ ॥ मेलयेन्मृगनाभिं च गद्यानकमितं तथा । श्लक्ष्णपिष्टो रसो नाम जायते मकरध्वजः ॥ ८ ॥
सोना १ भाग, शुद्ध पारा ८ भाग और पारेसे तिगुनी शुद्ध गन्धक इनको एकत्र खरल कर कज्जली बनालेवे । फिर उसको लालकपासके फूलोंके रस और घीग्वारकें रसमें उत्तम प्रकार खरल करके छायामें सुखाले, पश्चात् काँचकी शीशीमें भरकर उस शीशीके मुँहको बन्दकर वालुकायन्त्रमें नवीन उदय हुए सूर्य्यकी किरणोंके समान लाल वर्णकी विधिपूर्वक भस्म करे । जब स्वांगशीतल होजाय तब उक्त भस्म १ भाग, कपूर ४ भाग, लौंग, मिरच और जायफल ये प्रत्येक कपूरके बराबर भाग एवं कस्तूरी ८ माशे लेकर सबको एकत्र पीस लेवे । इस प्रकार यह मकरध्वजनामक रस सिद्ध होता है ॥ ५-८ ॥
वल्लं वल्लद्वयं वाथ ताम्बूलीदलसंयुतम् । भक्षयेन्मधुरं स्निग्धं मृदु मांसलवातलम् ॥ ९ ॥ श्रुतशीतं सितायुक्तं दुग्धं गोभवमाज्यकम् । मध्वाद्यं पिष्टमपरं मद्यानि विविधानि च ॥ १० ॥ करोत्यग्निबलं पुंसां वलीपलितनाशनः । मेधायुःकान्तिजननः कामोद्दीपनकृन्महान् ॥ अभ्यासात्साधकः स्त्रीणां शतं जयति नित्यशः ॥ ११ ॥
इसको प्रतिदिन दो रत्तीभर अथवा चार रत्तीभर पानमें रखकर सेवन करे । इसपर मधुर, स्निग्ध, हल्का और वातल मांसल एवं औटाकर स्वयं शीतल हुआ मिश्रीमिला गोदुग्ध और घृत, शहद, पिष्टक और अनेक प्रकारकें मद्यादि पदार्थ सेवन करे । यह रस मनुष्योंकी अग्निको दीपन करता, वली और पलितरोगको नष्ट करता है एवं मेधा, आयु, कान्ति और कामको बढानेवाला है । इसके सेवनसे मनुष्य नित्य सौ स्त्रियोंको भोगता है ॥ ९-१११ ॥
रतिकाले रतान्ते च पुनः सेव्यो रसोत्तमः । मानहानिं करोत्यासां प्रमदानां सुनिश्चितम् ॥ १२ ॥ कृत्रिमं स्थावरविषं जङ्गमं विषवारि च । न विकाराय भवति साधकानां च वत्सरात् ॥ १३ ॥