भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
१३४८ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरण
भागोऽस्य भागाश्चत्वारः कर्पूरस्य सुशोभनाः । लवङ्गं मरिचं जातीफलं कर्पूरमात्रया ॥ ७ ॥ मेलयेन्मृगनाभिं च गद्यानकमितं तथा । श्लक्ष्णपिष्टो रसो नाम जायते मकरध्वजः ॥ ८ ॥
सोना १ भाग, शुद्ध पारा ८ भाग और पारेसे तिगुनी शुद्ध गन्धक इनको एकत्र खरल कर कज्जली बनालेवे । फिर उसको लालकपासके फूलोंके रस और घीग्वारकें रसमें उत्तम प्रकार खरल करके छायामें सुखाले, पश्चात् काँचकी शीशीमें भरकर उस शीशीके मुँहको बन्दकर वालुकायन्त्रमें नवीन उदय हुए सूर्य्यकी किरणोंके समान लाल वर्णकी विधिपूर्वक भस्म करे । जब स्वांगशीतल होजाय तब उक्त भस्म १ भाग, कपूर ४ भाग, लौंग, मिरच और जायफल ये प्रत्येक कपूरके बराबर भाग एवं कस्तूरी ८ माशे लेकर सबको एकत्र पीस लेवे । इस प्रकार यह मकरध्वजनामक रस सिद्ध होता है ॥ ५-८ ॥
वल्लं वल्लद्वयं वाथ ताम्बूलीदलसंयुतम् । भक्षयेन्मधुरं स्निग्धं मृदु मांसलवातलम् ॥ ९ ॥ श्रुतशीतं सितायुक्तं दुग्धं गोभवमाज्यकम् । मध्वाद्यं पिष्टमपरं मद्यानि विविधानि च ॥ १० ॥ करोत्यग्निबलं पुंसां वलीपलितनाशनः । मेधायुःकान्तिजननः कामोद्दीपनकृन्महान् ॥ अभ्यासात्साधकः स्त्रीणां शतं जयति नित्यशः ॥ ११ ॥
इसको प्रतिदिन दो रत्तीभर अथवा चार रत्तीभर पानमें रखकर सेवन करे । इसपर मधुर, स्निग्ध, हल्का और वातल मांसल एवं औटाकर स्वयं शीतल हुआ मिश्रीमिला गोदुग्ध और घृत, शहद, पिष्टक और अनेक प्रकारकें मद्यादि पदार्थ सेवन करे । यह रस मनुष्योंकी अग्निको दीपन करता, वली और पलितरोगको नष्ट करता है एवं मेधा, आयु, कान्ति और कामको बढानेवाला है । इसके सेवनसे मनुष्य नित्य सौ स्त्रियोंको भोगता है ॥ ९-१११ ॥
रतिकाले रतान्ते च पुनः सेव्यो रसोत्तमः । मानहानिं करोत्यासां प्रमदानां सुनिश्चितम् ॥ १२ ॥ कृत्रिमं स्थावरविषं जङ्गमं विषवारि च । न विकाराय भवति साधकानां च वत्सरात् ॥ १३ ॥
[अधिकारः ] | भाषाटीकासहिता । | १३४९
मृत्युञ्जयो यथाऽभ्यासान्मृत्युं जयति देहिनाम् ।
तथाऽयं साधकेन्द्रस्य जरामरणनाशनः ॥१४॥
इस उत्तम रसको मैथुनके आदि और अन्तमें सेवन करे। यह स्त्रियोंके मानको निस्सन्देह दूर करता है। एक वर्ष पर्यन्त इस रसको सेवन करनेसे कृत्रिम, स्थावर, जङ्गम और जलीय जीवोंका विष कुछ भी असर नहीं करता, जिस प्रकार मृत्युञ्जय मन्त्रका जप करनेसे मनुष्योंकी मृत्यु दूर होजाती है उसी प्रकार यह रसेन्द्र भी प्राणियोंके जरा और मरणको नष्ट करता है ॥१२-१४॥
महेश्वररस ।
रसं भस्मीकृतं कोलं गन्धकं शोधितं समम् ।
लौहं कर्षद्वयं ताम्रमर्द्धतोलकसम्मितम् ॥ १५ ॥
सुवर्णं जारितं दद्याच्छाणार्द्धं सुविचक्षणः ।
अभ्रं कर्षद्वयं दद्याच्छाणार्द्धं चन्द्रचूर्णकम् ॥ १६ ॥
श्यामाबीजं वरीं चैव बलामतिबलां तथा ।
एलां च शङ्खपुष्पं च शाणमानं विनिक्षिपेत् ॥
जलेन वटिकां कृत्वा गुञ्जामात्रां प्रदापयेत् ॥ १७ ॥
सेवनादस्य कन्दर्परूपो भवति मानवः ।
सहस्रं याति नारीणामुत्साहो जायतेऽधिकः ॥ १८ ॥
रससिंदूर १ तोला, शुद्ध गंधक १ तोला, लोहा २ तोले, तांबा ६ माशे, जारणकिया सोना २ माशे, अभ्रक २ तोले, कपूर ६ माशे एवं विधारेके बीज, शतावर, खिरेंटी, कंघी, इलायची और शंखपुष्पी ये प्रत्येक चार चार माशे लेवे । सबको जलके द्वारा एकत्र खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इसकी प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करनेसे मनुष्य कामदेवके समान रूपवान् होता है और हजारों स्त्रियोंको भोगनेका उत्साह उत्पन्न होता है ॥१५-१८॥
नित्यं स्त्रीसेवनाद्यस्तु क्षीणशुक्रो भवेन्नरः ॥ १९ ॥
महाशुक्रो भवेत्सोऽपि सेवनादस्य नान्यथा ।
महाबलो महाबुद्धिर्जायते नात्र संशयः ॥ १२० ॥
स्थूलानां कर्षकः श्रेष्ठः कृशानां पुष्टिकारकः ।
रसौ विनाशयेद्रोगान्सप्तसप्ताहभक्षणात् ॥ २१ ॥
१३५० | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरगा-
जो पुरुष नित्यप्रति स्त्रीप्रसङ्ग करनेसे नष्टवीर्य्य होगया हो वह भी इसके सेवनसे अत्यन्त वीर्य्यवान्, महाबलवान् और बुद्धिमान् होता है इसमें कुछ सन्देह नहीं । इस रसको सात सप्ताह पर्यन्त सेवन करनेसे सब रोग नष्ट होते हैं एवं स्थूल पुरुषोंकी स्थूलता और कृश मनुष्योंकी कृशता दूर होकर शरीर पुष्ट होताहै॥१९-२१॥
स्वर्णसिंदूर ।
पलं रसेन्द्रस्य च गन्धकस्य हेम्नोऽपि कर्षं परिगृह्य सम्यक्। वटप्ररोहस्य रसेन यामं यामं विमर्द्याथ कुमारिकायाः ॥२२॥ तत्काचकूप्यां निहितं प्रयत्नात्पचेद्विधिज्ञः सिकताख्ययन्त्रे । ततो रजश्चोर्द्धगतं सुरम्यं प्रगृह्य यत्नादरुणप्रभं यत् ॥२३॥ तद्योजयेत्सर्वगदेषु वीक्ष्य धातुं बलं वह्निवृद्धिं वयश्च । रसायनं वृष्यतरं च बल्यं मेधाग्निकान्तिस्मरवर्द्धनं च ॥ २४ ॥
शुद्ध पारा एक पल, शुद्ध गंधक एक पल और सोना एक तोला लेवे । सबको एकत्र बडके अंकुरोंके रसमें एक प्रहरतक एवं घीग्वारके रसमें एक प्रहरतक खरल करे । फिर एक बोतलमें विधिपूर्वक बुद्धिमान् वैद्य उसको वालुकायंत्रमें पकावे । जब स्वयं शीतल होजाय तब सूर्योदयकी लाल लाल कान्तिके समान उस औषधिको बोतलमेंसे निकालकर पीस लेवे । इस स्वर्णसिन्दूरनामक रसको सब प्रकारके रोगोंमें विचारपूर्वक प्रयोग करे । यह रसायन धातु, बल, अग्नि और आयुकी वृद्धि, शरीरमें पुष्टि, वीर्य तथा बलकी वृद्धि करती है । मेधा, जठराग्नि और काम-शक्तिको प्रबल करती है ॥२१-२४॥
स्वल्पचन्द्रोदयमकरध्वज ।
जातीफलं लवङ्गं च कर्पूरं मरिचं तथा । प्रत्येकं तोलकं दत्त्वा सुवर्णस्य च माषकम् ॥ २५ ॥ अण्डजं माषमानं च सर्वतुल्यमथेश्वरम् । यत्नतो मर्दयेत्खल्ले चतुर्गुञ्जावटीं चरेत् ॥ २६ ॥ एष चन्द्रोदयो नाम रसो वाजीकरः परः । हन्ति रोगानशेषांश्च बलवीर्याभिवर्द्धनः ॥ २७ ॥
जायफल, लौंग, कपूर और कालीमिरच ये प्रत्येक एक एक तोला, सोना एक माश, कस्तूरी एक माशा और सब औषधोंके बराबर भाग रससिंदूर
ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता। १३५१
लेवे। सबको खरलमें रखकर उत्तम प्रकार मर्दन करे पश्चात् चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। यह स्वल्प चन्द्रोदयनामक रस अत्यन्त वाजीकरण,सर्वरोग नाशक, बल, वीर्य एवं अग्निवर्द्धक है। इसको माखन, मिश्री अथवा पानके रसके साथ सेवन करना चाहिये ॥ २६-२७ ॥
वृहच्चन्द्रोदयमकरध्वज ।
पलं मृदुस्वर्णदलं रसैन्द्रात्पलाष्टकं षोडश गन्धकस्य ।
शोणैः सुकार्पासभवैः प्रसूनैः सव विमर्द्याथ कुमारि-
काद्भिः ॥ २८ ॥ तत्काचकुम्भे निहितं सुगाढे मृत्क-
र्पटीभिर्दिवसत्रयं च । पचेत्क्रमाग्नौ सिकतारुययन्त्रे
ततो रजः पल्लवरागरम्यम् ॥ २९ ॥ संगृह्य चैतस्य पलं
पलानि चत्वारि कर्पूररजस्तथैव । जातीफलं सोषण-
मिन्द्रपुष्पं कस्तूरिकाया इह शाणमेकम् ॥ १३० ॥
सोनेके वरक चार तोले, शुद्ध पारा ३२ तोले, शुद्ध गन्धक ६४ तोले इनको एकत्र कर कज्जली बनावे, फिर लालवर्णकी वनकपासके फूलोंके रस और घीग्वारके रसमें खरल कर उसको कांचकी शीशीमें भर ऊपरसे कपरामटी करके धूपम सुखालेवे। पश्चात् उस बोतलको बालुकायन्त्रमें रखकर मृदु, मध्य और तीक्ष्ण इस क्रमसे तीन दिनतक अग्निदेवे। जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब उसमेंसे लालवर्णके कोमल पत्तोंके समान रमणीय भस्मको निकाललेवे। तदनन्तर यह भस्म चार तोले, कपूर १६ तोले एवं जायफल, त्रिकुटा, लौंग, कस्तूरी ये प्रत्येक चार चार माशे लेवे, सबको जलद्वारा एकत्र खरल कर गोलियाँ बनालेवे ॥ २८-१३० ॥
चन्द्रोदयोऽयं कथितोऽस्य वल्लो भुक्तोऽहिवल्लीदलमध्य-
वर्त्ती । मदोन्मदानां प्रमदाशतानां गर्वाधिकत्व श्लथ-
यत्यकाण्डे ॥ ३१ ॥ घृतं घनीभूतमतीव दुग्धं मृदूनि
मांसानि समस्तकानि । मांसात्रपिष्टानि भवन्ति पथ्या-
न्यानन्ददायीन्यपराणि चात्र ॥ ३२ ॥ वलीपलिताना-
शनस्तनुभृतां वयःस्तम्भनः समस्तगदखण्डनः प्रचुर-
रोगपञ्चाननः । गृहेऽपि गृहभूपतिर्भवति यस्य चन्द्रो-
दयः स पञ्चशरदर्पितो मृगदृशां भवेद्वल्लभः ॥ ३३ ॥
१३५२ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-
इसको बृहच्चन्द्रोदयरस कहते हैं। इस रसको प्रतिदिन दो या तीन रत्ती प्रमाण ले पानमें रखकर सेवन करे । इसके सेवनसे मनुष्य सैकड़ों मन्दोन्मत्त स्त्रियोंके मदको असमयमें दूर करता है। इसपर घृत, खूब औटाकर गाढा हुआ दूध, मृदु मांस, अन्नके और पिष्ठीके बने पदार्थ एवं अन्यान्य सब प्रकारकें आनन्ददायक पथ्य पदार्थ हितकारी हैं। यह रस वली और पलितरोगको नष्ट करनेवाला, मनुष्योंकी आयुको स्थापन करनेवाला, समस्त रोगोंको नाश करनेके लिये मृत्युञ्जय है। यह चन्द्रोदय जिसके घरमें भी होता है वह घरका राजा होता है। वह मृगनयनी स्त्रियोंका प्यारा और कामदेवके गर्वको दूर करता है ॥ ३१-३३ ॥
खण्डाभ्रक ।
पक्वचूतरसद्रोणः पात्रं स्याच्छुद्धखण्डतः ।
घृतमर्द्धं ततो ग्राह्यं चतुर्थांशं च नागरम् ॥ ३४ ॥
तदर्द्धं मरिचं प्रोक्तं तदर्द्धां पिप्पली मता ।
तोयं खण्डसमं दद्यात्सर्वमेकत्र संस्थितम् ॥ ३५ ॥
विपचेन्मृन्मये पात्रे यदा दर्वीप्रलेपनम् ।
चूर्णान्येषां ततो दद्यात्पत्रं पलचतुष्टयम् ॥ ३६ ॥
ग्रन्थिकं चित्रकं मुस्तं धन्याकं जीरकद्वयम् ।
त्र्यूषणं जाति तालीशं चूर्णमेषां पलं पलम् ॥ ३७ ॥
त्वगेलाकेशराणां च प्रत्येकं च पलं तथा ।
सिद्धशीते च मधुनः प्रस्थं दत्त्वा विघट्टयेत् ॥
तत्सर्वमेकतः कृत्वा स्निग्धे भाण्डे निधापयेत् ॥ ३८ ॥
उत्तम प्रकार पकेहुए आमोंका रस ३२ सेर, मिश्री ८ सेर, गौका घी चार सेर, सोंठका चूर्ण दो सेर, मिरचोंका चूर्ण एक सेर, पीपलका चूर्ण आध सेर और जल आठ सेर लेवे । सबोंको मिट्टीके उत्तम पात्रमें एकत्रकर विधिपूर्वक पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होकर करछीसे लगने लगे तब उसमें तेजपात १६ तोले, गठिवन, चीतेकी जड, नागरमोथा, धनियाँ, जीरा, काला जीरा, त्रिकुटा, जायफल, तालीशपत्र, दारचीनी, छोटी इलायची और नागकेशर इन प्रत्येक औषधियोंको चार चार तोले ले बारीक पीसकर मिलादेवे । जब अच्छे प्रकार पकजाय तब उतारकर शीतल होजानेपर उसमें एकप्रस्थ शहद डालकर सबको एकमएक करके चिकने बर्तनमें भरकर रखदेवे ॥ ३४-३८ ॥
ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३५६
भोजनादादितः खादेत्पलमानं प्रमाणतः ।
गच्छेत्कन्दर्पदर्पान्धो रागवेगाकुलेन्द्रियः ॥ ३९ ॥
शतं वापि तदर्द्धं वा रमेत्स्त्रीणां पुमानयम् ।
संसेव्य भेषजं ह्येतद्वन्ध्यायां जनयेत्सुतम् ॥ ४० ॥
वीरं सर्वगुणोपेतं शतायुश्च भवेदयम् ।
मृतवत्सा च या नारी या च गर्भोपघातिनी ॥ ४१॥
साऽपि सूते सुतं सत्यं नारायणपरायणम् ।
वन्ध्याऽपि लभते पुत्रं वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ ४२ ॥
कुरङ्ग इव संहृष्टो मातङ्ग इव विक्रमः ।
सदा भेषजसंसेवी भवेन्मारुतवेगवान् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर प्रतिदिन भोजन करनेसे पहले इसको चार चार तोले प्रमाण सेवन करें। इसके सेवनसे कामदेवके मदसे अन्धीभूत और रागके वेगसे व्याकुल इन्द्रिय-वाला मनुष्य सौ या पचास स्त्रियोंको भोगता है। इस औषधिको सेवनकर वन्ध्या स्त्री भी वीर, सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त और शतायुषी पुत्रको उत्पन्न करती है। जिस स्त्रीके सन्तान होकर मरजाती है और जिसके गर्भ पतित होजाता है वह स्त्रीभी सत्य और नारायण परायण पुत्रको जनती है। इसक प्रतापसे वन्ध्या स्त्री पुत्रवाली और वृद्ध मनुष्य तरुण होता है। इस औषधिको सर्वकालमें नियमितरूपसे सेवन करनेवाला मनुष्य हिरनके समान हृष्ट पुष्टाङ्ग तथा प्रसन्न, हाथीके समान पराक्रमी और वायुके समान वेगवाला होता है ॥ ३९-१४३ ॥
हन्ति सर्वामयं घोरं कासं श्वासं क्षयं तथा ॥ ४४ ॥
दुर्नामाजीर्णकं चैव अम्लपित्तं सुदारुणम् ।
तृष्णां छर्दिं च मूर्च्छा च शूलमष्टविधं जयेत् ॥ ४५ ॥
खण्डाभ्रकमिदं प्रोक्तं भार्गवेण स्वयम्भुवा ।
वयस्यं मेध्यमायुष्यं सर्वपापविनाशनम् ॥ ४६ ॥
ग्रहरक्षःपिशाचघ्नमपस्मारविनाशनम् ।
पाण्डुरोगं प्रमेहं च मूत्रकृच्छ्रं च नाशयेत् ॥ ४७ ॥
वश्या योषिद्भवेत्पुंसां पुमान् वश्यश्च योषिताम् ।
दृष्टं वारसहस्रं च कथमत्र विचारणा ॥ ४८ ॥
१३५४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरणा-
यह सर्वप्रकारके भयङ्कर रोग, खाँसी, श्वास, क्षय, बवासीर अजीर्ण, अम्लपित्त, तृषा, वमन, मूर्च्छा और आठ प्रकारके शूल इत्यादि रोगोंको जीतता है। इस खण्डाभ्रकरसायनको ब्रह्माके पुत्र भृगुऋषिने कहा है। यह आयु और मेधाको बढानेवाला तथा सब पापोंको हरनेवाला है। ग्रह, राक्षस और पिशाचोंकी बाधा, अपस्मार, पाण्डुरोग, प्रमेह और मूत्रकृच्छ्रादि विकारोंको शीघ्र नष्ट करता है। इससे स्त्री पुरुषोंके और पुरुष स्त्रियोंके वशीभूत होजाता है यह हजारों बार परीक्षा-कर देखागया है इसमें सन्देह नहीं ॥
गुडकूष्माण्ड ।
कूष्माण्डात्पलशतं सुस्विन्नं निष्कुलीकृतम् ।
प्रस्थं च घृततैलस्य तस्मिंस्तप्ते निधापयेत् ॥ ४९ ॥
त्वक्पत्रधान्यकव्योषजीरकैलाद्वयानलम् ।
ग्रन्थिकं चव्यमातङ्गपिप्पलीविश्वभेषजम् ॥ १५० ॥
शृङ्गाटकं कसेरुं च प्रलम्बं तालमस्तकम् ।
चूर्णीकृतं पलाशं च गुडस्य तुलया पचेत् ॥
शीतीभूते पलान्यष्टौ मधुनः सम्प्रदापयेत् ॥ ५१ ॥
छीलकर उसीजे हुए पेठेके टुकडे १०० पल, घी और तिलका तेल एक एक प्रस्थ और पुराना गुड १०० पल लेवे । प्रथम उक्त पेठेके टुकडोंको सुखाकर घी तेलमें भूनलेवे, फिर सबको एकत्रकर पेठेके रसमें पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें दारचीनी, तेजपात, धनियाँ, त्रिकुटा, जीरा, दोनों तरहकी इलायची, चीतेकी जड, पीपलामूल, चव्य, गजपीपल, पीपल, साँठ, सिंघाडे, कसेरू खीरेके बीज और ताडका मस्तक ये प्रत्येक चार चार तोले चूर्ण कर डाल देवे और शितल होनेपर आठ पल शहद मिलाकर चिकने वासनमें भरकर रखदेवे ॥ १४९-१५१ ॥
कफपित्तानिलहरं मन्दाग्नौ च प्रशस्यते ।
कृशानां बृंहणं श्रेष्ठं वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ५२ ॥
प्रमदासु प्रसक्तानां ये च स्युः क्षीणरेतसः ।
क्षयेण च गृहीतानां परमेतद्भिषग्जितम् ॥ ५३ ॥
कासं श्वासं ज्वरं हिक्कां हन्ति च्छर्दिमरोचकम् ।
गुडकूष्माण्डकं ख्यातमश्विभ्यां समुदाहृतम् ॥ ५४ ॥
खण्डकूष्माण्डवत्पाच्यः स्विन्नकूष्माण्डकद्रवः ॥५५ ॥
५ धिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३५५
इसके सेवनसे कफ, पित्त और वातजन्य रोग नष्ट होते हैं। यह मन्दाग्निमें सेवन करना हितकर है। कृश मनुष्योंको अत्यन्त पुष्टिकारक और उत्तम वाजीकरण है। जो पुरुष निरन्तर स्त्रियोंमें आसक्त होनेसे क्षीणवीर्य होगये हों और जो क्षयरोगसे ग्रसित हों उनका यह औषध परमोपयोगी है तथा खाँसी श्वास, ज्वर, हिचकी, वमन और अरुचि आदि विकारोंको नष्ट करती है । इस गुडकूष्माण्डनामक औषधको अश्विनीकुमारोंने वर्णन किया है। इसमें खण्डकूष्माण्डके समान आठ सेर पेठेको उबालकर रस बनावे ॥ ५२–५५ ॥
कामेश्वरमोदक।
धात्रीसैन्धवकुष्ठकट्फलकणाशुण्ठीयमानीद्वयं
यष्टीजीरकयुग्मधान्यकशठीशृङ्गीवचाकेशरम् ।
तालीशं त्रिसुगन्धिकं समरिचं पथ्याक्षमेभिः समं
चूर्णीकृत्य मनाक् स्वबीजसहितं भृष्टा तु शक्राशनम्॥५६॥
सर्वेषां द्विगुणां सितां सुविमलां यत्नाद्भिषङ् निक्षिपेत्
क्षौद्रं चापि घृतं प्रशस्तदिवसे कुर्याच्छुभान्मोदकान् ।
कर्पूरैरवचूर्णितानपि हितान्दत्त्वा तिलान्भर्जितान्
गोप्योऽयं क्षितिमण्डलेऽमितधिया पाखण्डिनामग्रतः॥५७॥
आमले, सैंधानमक, कूठ, कायफल, पीपल, सोंठ, अजवायन, अजमोद, मुलहठी जीरा, कालाजीरा, धनियाँ, कचूर, काकड़ासिंगी, वच, नागकेशर, तालीशपत्र, दारचीनी, इलायची, तेजपात, मिरच, हरड और बहेडा इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर बीजोंसहित भुनीहुई भाँगका चूर्ण सबकी बराबर और समस्त चूर्णसे दुगुनी मिश्री, शहद तथा घृत लेकर सबको यथाविधिसे पकावे । पश्चात् सुगन्धिके लिये कपूरका चूर्ण और भुनेहुए तिलोंका चूर्ण मात्रानुसार डालकर उत्तम मोदक बनालेवे । बुद्धिमान् वैद्योंको यह योग पाखण्डियोंसे गुप्त रखना चाहिये ॥ ५६ ॥ ५७ ॥
आधिव्याधिहरः परं क्षयहरः कुष्ठापहो बृंहणः स्त्रीणां
तोषकरो मुखद्युतिकरः शुक्राग्निवृद्धिप्रदः। कासश्वास-
बलासरो़गनिचयप्रध्वंसनः प्राणिनां प्रोक्तो ब्रह्मसुतेन
सर्वसुखदः कामेश्वरो मोदकः ॥ ५८ ॥ अहगणपरीहीनः
सर्वशास्त्रप्रवीणो ललितविमलकीर्तिः प्राप्तकन्दर्पमूर्त्तिः ।
१३५६ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-
विगतसकलभीतिर्गीतवाद्याङ्गनीतिर्भवति भुवि स देवो येन भुक्तः प्रयत्नात् ॥ ५९ ॥
इसको शुभ दिनमें सेवन करनेसे मानसिक और शारीरिक सब विकार, क्षय और कुष्ठरोग दूर होते हैं। यह अत्यन्त बृंहण है । स्त्रियोंको प्रसन्न करनेवाला, मुखकी कान्ति, वीर्य और जठराग्निकी वृद्धि करनेवाला है । इससे खाँसी, श्वास और बलास आदि मनुष्योंके रोगसमूह नष्ट होते हैं । इस सर्वसुखदायी कामेश्वर-मोदकको भृगुजीने कहा है । जो मनुष्य इसको विधिपूर्वक सेवन करता है वह सम्पूर्ण ग्रहोंकी बाधासे मुक्त, सर्वशास्त्रोंमें कुशल, निर्मल कीर्त्तिवाला, कामदेवके समान रूपवाला, समस्त भयोंसे रहित, गीत वाद्यादिको जाननेवाला और देवताओंके समान होता है ॥ ५८ ॥ ५९ ॥
रहसि युवतिखेलासम्पुटाकर्षहर्षार्द्रमयति युवतीनां केलिकौतूहलेन । यदि कथमपि भुक्तो भोजनादा वथान्ते सुरतरभसमुच्चैर्नष्टकामं प्रकामम् ॥ १६० ॥ यस्मान्नव्यबृहस्पतिस्तनुधियो यस्मात्सदा वीर्यवान् यस्मादुन्मददाक्षिणात्ययुवतीसम्भोगकौतूहली । यस्मात्काव्यकुतूहली सुकविता सञ्जायते लीलया श्रीमद्भिः प्रतिवासरं क्षितितले संसेव्यतां मोदकः॥१६१॥
इसको सेवन करनेवाला बडे आनन्दसे स्त्रियोंमें रमण करता है । यदि इसको भोजनके आदि और अन्तमें सेवन करे तो सुरतसमय नष्ट हुआ काम फिर प्रबल होता है । जिससे मनुष्य बृहस्पतिके समान बुद्धिमान्, अत्यन्त वीर्यवान्, कामक्रीडा करनेमें चतुर, स्त्रियोंके साथ सम्भोगरूपी कुतूहल करनेवाला और सहजमें सुन्दर कविता तथा काव्य कुतुहलको प्राप्त होता है ऐसे मोदक श्रीमानोंको प्रतिदिन नियमसे सेवन करने चाहिये ॥ १६० ॥ १६१ ॥
अन्य कामेश्वरमोदक। चूर्णीशं गगनं घनार्द्धविमलं गन्धं च कुष्ठामृता मेथी मोचरसो विदारि मुषली गोक्षूरकं चेक्षुरः । भीरुं चैव कशेरुकं यम (मा) निका तालाङ्कुरं धान्यकं यष्टी नागबला तिला मधुरिका जातीफलं सैन्धवम् ॥६२॥
ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३५७
भारङ्गीं कर्कटशृङ्गकं त्रिकटुकं जीरद्वयं चित्रकं चातुर्जातपुनर्नवा करिकणा द्राक्षा शठी कट्फलम् । शाल्मल्यंघ्रि फलत्रिकं कपिभवं बीजं समं चूर्णयेत् चूर्णांर्द्धा विजया सिता द्विगुणिता मध्वाज्यमिश्रं तु तत् ॥ कर्षाद्धां गुडिकाथ कर्षमथवा सेव्या सतां सर्वदा पेयं क्षीरमनु स्ववीर्यकरणे स्तम्भेऽप्ययं कामिनाम् ॥६३॥
कूठ, गिलोय, मेथी, मोचरस, विदारीकन्द, मुसली, गोखरू, तालमखाने, शता- वर, कसेरू, अजवायन, ताडके अंकुर, धनियाँ, मुलहठी, गंगेरन, घुलेहुए तिल, सौंफ, जायफल, सेंधानमक, भारङ्गी, काकडासिंगी, त्रिकुटा, जीरा, कालाजीरा, चीतेकी जड, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, पुनर्नवा गजपीपल, दाख, कचूर, कायफल, सेमलकी मुसली, त्रिफला, कौंछके बीज, इनको समान भाग लेकर चूर्ण करलेवे । इस चूर्णमें सब चूर्णसे चौथाई भाग अभ्रक, अभ्रकसे आधा भाग शुद्ध गन्धक और सब चूर्णसे आधी भांग एवं सबसे दुगुनी मिश्री, शहद और घी यथाविधि मिलाकर पकावे । फिर आधे कर्ष अथवा एक एक कर्षके लड्डू बनालेवे । प्रतिदिन एक एक लड्डू खावे और ऊपरसे दूध पीवे तो इससे कामी पुरुषोंके वीर्य स्तम्भन होता है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥
रतिवल्लभमोदक ।
शक्राशनस्य बीजानां चूर्णानि पलपञ्च च । हविषः कुडवं चैव सिताप्रस्थं प्रगृह्य च ॥ ६४ ॥ शतावरीरसप्रस्थं तथा शक्राशनस्य च । गव्यमाजं पयः प्रस्थं ततः प्रस्थद्वयं पचेत् ॥ ६५ ॥
भाँगके बीजोंका चूर्ण २० तोले, गोघृत १६ तोले, मिश्री एक प्रस्थ, शता- वरका रस एक प्रस्थ, भाँगका रस एक प्रस्थ, गौका दूध एक प्रस्थ और बक- रीका दूध एक प्रस्थ, इन सबको यथाविधि एकत्र मिलाकर मृदु अग्निके द्वारा पकावे ॥ ६४ ॥ ६५ ॥
धात्री द्विजीरकं मुस्तं त्वगेलापत्रकेशरम् । आत्मगुप्ता चातिबला तालांकुरकशेरुकम् ॥ ६६ ॥ शृङ्गाटकं त्रिकटुकं धान्यमभ्रं च वङ्गकम् । पथ्या द्राक्षा द्विकाकोल्यौ खर्जूरं क्षुरकं तथा ॥ ६७ ॥
| १३५८ | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरणा- |
|---|
कटुका मधुकं कुष्ठं लवङ्गं सारसैन्धवम् ।
यमानी चाजमोदा च जीवन्ती गजपिप्पली ॥ ६८ ॥
प्रत्येकं कर्षमेकं तु चूर्णितानि शुभानि च ।
कुडवार्द्धं पादशेषे मधुनः प्रक्षिपेत्तथा ॥
मृगाण्डजं सकर्पूरं यथालाभं विनिक्षिपेत् ॥ ६९ ॥
जब पाक पकते पकते अवलेहके समान गाढा होजाय तब उसमें आमले, जीरा, काला जीरा, नागरमोथा, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, कौंछके बीज, कंघी, ताडके अंकुर, कशेरू, सिंघाडे, त्रिकुटा, धनियाँ, अभ्रक, वङ्ग, हरड, दाख, काकोली, खजूर, तालमखाना, कुटकी, मुलहठी, कूठ, लौंग, सैंधानमक, अजवायन, अजमोद, जीवन्ती और गजपीपल इन प्रत्येक औषधोंके चूर्णको एक एक कर्ष डाल देवे । जब उत्तमप्रकार पाक पककर सिद्ध होजाय तब शीतल होजानेपर उसमें शहद ८ तोले और सुगन्धिके लिये किञ्चित् कस्तूरी तथा कपूर मिलाकर लड्डू बनालेवे ॥ ६६-६९ ॥
रतिवल्लभनामाऽयं सेव्यमानो महारसः ।
परमोजस्करो बल्यो वातव्याधिविनाशनः ॥ ७० ॥
वातपित्तहरो वृष्यो दृष्टिसन्दीपनः परः ।
पित्तश्लेष्मास्रपित्तघ्नो विषगुल्मज्वरापहः ॥ ७१ ॥
यापयत्येष मन्दाग्निं रोगाणां क्षयहेतुकः ॥ ७२ ॥
न भवेल्लिङ्गशैथिल्यं वृद्धानां पुष्टिवर्द्धनम् ।
कृशानां बृंहणं श्रेष्ठं वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ७३ ॥
यस्य गेहे सदा बह्व्यः पत्न्यः स्युः सुमनोहराः ।
तेन सेव्यः सदैवायं मोदको रतिवल्लभः ॥ ७४ ॥
यह रतिवल्लभनामक महारस उचित मात्रासे प्रतिदिन सेवन करना चाहिये । यह अत्यन्त ओजस्कर, बलकर, वातव्याधिनाशक, वात-पित्तहर, वृष्य, नेत्र-शक्तिवर्द्धक, पित्त, कफ, रक्तपित्त, विष, गुल्मज्वर, मन्दाग्नि और क्षयरोगोंको नाश करनेवाला है । इससे लिङ्गमें शिथिलता नहीं होती । यह वृद्ध मनुष्योंको भी पुष्ट करता है । कृश मनुष्योंको बृंहण और उत्तम वाजीकरण है । जिसके घरमें बहुतसी सुन्दरी स्त्रियाँ हों उसको यह रतिवल्लभमोदकरस निरन्तर सेवन करना चाहिये ॥ १७०-१७४ ॥
ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३५९
कामाग्निसन्दीपनमोदक ।
कर्षो रसो गन्धकमभ्रकं च द्विक्षारचित्रे लवणानि पञ्च ।
शठी यमानीद्वयकीटहारी तालीशपत्राण्यपरं द्विकर्षम् ॥ ७५ ॥
जीरं चतुर्जातलवङ्गजातीफलं च कर्षत्रयमेवमन्यत् ।
सवृद्धदारं कटुकत्रयं च तथा चतुःकर्षमितं निबोध ॥ ७६ ॥
धन्याकयष्टीमधुरीकशेरुकर्षाः पृथक् पञ्च वरी विदारी ।
वरेभकर्णैभकणात्मगुप्ताबीजं तथा गोक्षुरबीजयुक्तम् ॥ ७७ ॥
सबीजपत्रेन्द्ररजः समानं समा सिता क्षौद्रघृतं च तुल्यम् ।
कर्षैकमिन्दोरथ मोदकं तत्कामाग्निसन्दीपनमेतदुक्तम् ॥ ७८ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रक, जवाखार, सज्जी, चीता, पाँचोंनमक, कचूर अजवायन, अजमोद, वायबिडङ्ग और तालीशपत्र ये प्रत्येक एक एक कर्ष, जीरा दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग, जायफल ये दो दो कर्ष, विधारेके बीज, त्रिकुटा प्रत्येक तीन तीन कर्ष धनियाँ, मुलहठी, सौंफ, कसेरू ये चार चार कर्ष, शतावर, विदारीकन्द, त्रिफला, हस्तिकर्ण, पलाशकीजड, गजपीपल, कौंछके बीज, गोखुरु ये प्रत्येक पाँच पाँच कर्ष एवं बीज और पत्तोंसहित भाँगका चूर्ण सब औषधियोंके चूर्णके बराबर भाग तथा सर्वोंकी बराबर मिश्री, शहद : और घी लवे । सबको विधिपूर्वक मन्द मन्द अग्निसे पकावे फिर उसमें एक कर्ष कपूर डालकर करछीसे सबको एकम एक करके मोदक बनालेवें । इस रसको कामाग्निसन्दीपन कहते हैं ॥७५-७८॥
वृष्यस्त्वतः परतरं सततं न दृष्ट एनं निषेव्य मनुजः प्रमदासहस्रम् ।
गच्छेत्र लिङ्गशिथिलत्वमवाप्नुयाच्च नागाधिपं विजयते बलतः प्रमत्तम् ॥ ७९ ॥
कान्त्या हुताशनमपि स्वरतो मयूरान् वाहं जवेन नयनेन महाविहङ्गम।
वातानशीतिमथ पित्तगदं समग्रं श्लेष्मोत्थविंशतिरुजः परमग्निमान्द्यम् ॥ १८० ॥
दुर्नामकामलभ गन्दरपाण्डुरोग मेहातिसारकृमिहृद्ग्रहणीप्रदोषान् ।
कासज्वरश्वसनपीनसपार्श्वशूलशूलामॢपित्तसहितांशिरोजान् समस्तान् ॥ ८१ ॥
हत्वा गदानपि च तत्पुमपत्यकारि
१३६० भैषज्यरत्नावली [ वाजीकरणा- ]
सर्वर्तुपथ्यमथ सर्वसुखप्रदायि । वृष्यं वलीपलितहारि रसायनं स्याच्छ्रीमूलदेवकथितं परमं प्रशस्तम् ॥८२ ॥
इसके सेवनसे निरन्तर वीर्य्यकी वृद्धि होती है । मनुष्य हजारों स्त्रियोंको भोगता है तो भी उसका लिंग शिथिल नहीं होता बल्कि ऐरावत हाथीके समान दृढ और बलवान् होजाता है । अग्निके समान प्रदीप्त कान्ति, मोरके समान स्वर, घोडेके समान वेग और गरुडके समान दृष्टिशक्ति प्रबल होती है । यह मोदक अस्सी प्रकारके वातरोग, समस्तपित्तरोग, बीस प्रकारके कफरोगों एवं दुर्नामादि उल्लिखित सर्व प्रकारके रोगोंको तत्काल नष्ट करता है । अग्निको अत्यन्त प्रदीप्तकर पुरुष सन्तानको बढाता है । यह सर्व ऋतुओंमें सेवन करने योग्य सब प्रकारके सुखोंकों देनेवाला, वयवृद्धि और पुष्टिकारक, वली और पलितरोगसंहारक एवं परमोत्तम रसायन है । इसको श्रीमुलदेवजीने वर्णन किया है ॥ १७९-१८२ ॥
बृहच्छतावरीमोदक ।
शतावरी श्वदंष्ट्रा च बला चातिबला तथा । मर्कटीक्षुरबीजं च विदारीकन्दजं रजः ॥ ८३ ॥ एतानि समभागानि पलिकानि विचूर्णयेत् । तस्माच्चतुर्गुणं देयं त्रैलोक्यविजयारजः ॥ ८४ ॥ एतदेकीकृतं यावत्तदर्द्धं माहिषं पयः । तावन्मात्रेण दातव्यः शतावर्या रसस्तथा ॥ ८५ ॥ विदार्य्याः स्वरसप्रस्थं सिता पलशतद्वयम् । गोलयित्वा सितां चैव पात्रे ताम्रमये दृढे ॥ ८६ ॥ पाचयेत्पाकविद्वैद्यो मोदकं परमं हितम् । त्र्यूषणं त्रिफला दन्ती त्रिजातं सैन्धवं शठी ॥ ८७ ॥ धान्यकं बालकं मुस्तं कस्तूरी गोस्तनी तुगा । जातीकोषफलं मांसी पत्रं नागेन्द्रग्रन्थिकम् ॥ ८८ ॥ शतपुष्पा चवी दारु प्रियङ्गुं सलवङ्गकम् । सरलं शैलजं कुष्ठं जातीपुष्पं यमानिका ॥ ८९ ॥ कट्फलं केशरं मेथी मधुरं सुरदारु च । मिषिस्तालीशपत्रं च खर्जूरं रसगन्धकौ ॥ ९० ॥
धिकारः ] 'भाषाटीकासहिता । १३६१
चन्दनं तगरं क्षारं प्रत्येकं कर्षसम्मितम् ।
आलोड्य त्रिसुगन्धेन कर्पूरेणाधिवासयेत् ॥
काञ्चने राजते पात्रे स्थाप्यमेतद्भिषग्वरैः ॥ ९१ ॥
शतावर, गोखुरू, खिंरेंटी, कंघी, कौंछके बीज, तालमखाने और विदारीकन्द इनको चार चार तोले लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर सब चूर्णसे चौगुना बीजसहित भाँगका चूर्ण और समस्त चूर्णसे आधा भाग भैंसका दूध, शतावरका रस भी दूधके ही बराबर भाग, विदारीकन्दका स्वरस १ प्रस्थ और मिश्री २०० पल लेवे । सबोंको यथाविधिसे एकत्र मिलाकर ताँबेके बर्त्तनमें पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें त्रिकुटा, त्रिफला, दन्तीकी जड, त्रिजातक सैंधानोन, कचूर, धनियाँ, सुगन्धवाला, नागरमोथा, कस्तूरी, दाख, वंशलोचन, जावित्री, जायफल, बालछड, तेजपात, गठिवन, सोया, चव्य, दारुहल्दी, फूलप्रियंगु, लौंग, धूपसरल, भूरिछरीला, कूट, चमेलीके फूल, अजवायन, कायफल, नागकेशर, मेथी, मुलहठी, देवदारु, सोंफ, तालिशपत्र, खजूर, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लालचन्दन, तगर और जवाखार ये प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष प्रमाण ले बारीक कूटपीसकर डालदेवे । पश्चात् दारचीनी, इलायची, तेजपात और कपूर इनका चूर्ण सुगन्धिके लिये डालकर सबको एकम एक करके उत्तम मोदक बनालेवे और उनको सोने या चाँदी अथवा मिट्टीके पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ ८३-१९१ ॥
प्रातर्भोजनकाले वा भक्षयेत्तु विचक्षणः ।
कर्षप्रमाणं कर्त्तव्यं क्षीरं चानु पिबेत्पलम् ॥९२॥
शतं भजेद्वरस्त्रीणां न च शुक्रक्षयो भवेत् ।
न तस्य लिङ्गशैथिल्यं शुक्रसञ्जननं परम् ॥९३॥
क्षयं चैव महाव्याधिं पञ्च कासांस्तुदुस्तरान् ।
वातजान्पैत्तिकांश्चैव कफजान्सान्निपातिकान् ॥९४॥
हन्त्यष्टादश कुष्ठानि वातरक्तादिकानि च ।
प्रमेहं श्लीपदं शोथं लक्ष्मीकान्तिविवर्द्धनम् ॥९५॥
सर्वांनर्शोगदान् हन्ति वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ।
व्याधीन्कोष्ठगतानन्याञ्जनार्दन इवासुरान् ॥९६॥
नातः परतरं श्रेष्ठं विद्यते वाजिकर्मसु ।
८६
१३६२ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-
स्त्रीणां चैवानपत्यानां दुर्बलानां च देहिनाम् ॥९७॥
क्लीबानामल्पशुक्राणां जीर्णानामल्परेतसाम् ।
ओजस्तेजः स्वरं बुद्धिमायुः प्राणं विवर्द्धयेत् ॥९८॥
इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल अथवा भोजनके समय एक एक तोला प्रमाण भक्षण करे और ऊपरसे चार तोले दूधका अनुपान करे । इसके सेवनसे सैंकडों स्त्रियोंके साथ रमण करनेपरभी वीर्य क्षय नहीं होता और न लिङ्ग शिथिल होता है। विशेषकर शुक्रकी वृद्धि होती है । क्षय, राजयक्ष्मा, पाँचप्रकारकी खाँसी, वातज, पित्तज, कफज और सन्निपातजनितरोग, अठारह प्रकारका कुष्ठ, वातरक्त, प्रमेह, श्लीपद, सूजन और सब प्रकारका अर्श, कोष्ठगत रोग एवं अन्यान्य भयंकर व्याधियोंको यह औषध इस प्रकार तत्काल नष्ट करता है जिस प्रकार विष्णुभगवान् असुरोंको तत्क्षण नाश करदेते हैं । वाजीकर्ममें इससे बढकर अन्य औषधि नहीं है । यह लक्ष्मी तथा कान्तिको बढाती है तथा वन्ध्या स्त्रियों, दुर्बल मनुष्यों, नपुंसक, अल्पवीर्य, वृद्ध जनों और क्षीणवीर्य पुरुषोंको अत्यन्त हितकारी, ओज, तेज, स्वर, बुद्धि, आयु और प्राणोंको बढाती है ॥ ९२–९८ ॥
महाकामेश्वरमोदक ।
यथोक्तं द्रव्यसंचूर्णं प्रयोज्यं मृतमभ्रकम् ।
गगनाद्धं शुद्धलौहंलौहार्द्धं वङ्गभस्मकम् ॥९९॥
जातीकोषफलं चैव तत्र संचूर्ण्य दापयेत् ।
त्रिकटु त्रिफला मुस्तं चातुर्जातकसैन्धवम् ॥२००॥
भृङ्गजीरकयुग्मं च धन्याकं ग्रन्थिपर्णकम् ।
मांसी शतावरी कुष्ठं तुगा द्राक्षा लवङ्गकम् ॥१॥
बलातिबलामूलं च चविका देवताडकम् ।
यमानी शतपुष्पा च मर्कटीबीजबिल्वयोः ॥२॥
काकोली क्षीरकाकोली तालांकुरसटङ्कणम् ।
शालपर्णी त्रिकण्टं च चित्रकं कुन्दुरुर्मुग ॥३॥
पुनर्नवाऽश्वगन्धा च मोचकं गजपिप्पली ।
कट्फलं तालमस्तं च यष्टीमधुकमेव च ॥४॥
ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३६३
मधूरिका च तालीशमनन्ता च प्रियङ्कुकम् ।
बालकं वृद्धदारं च शाल्मली पिण्डखर्जुरम् ॥ ५ ॥
विदारी पृश्निपर्ण्यंघ्रि पद्मकं क्षुरबीजकम् ।
मेथी परूषकं चैव चन्दनं मरिचं तिलम् ॥ ६ ॥
शृङ्गी सरलकाष्ठं च कर्पूरं विश्वभेषजम् ।
समभागानि चैतानि चूर्णमेषां प्रकल्पयेत् ॥ ७ ॥
शोधितं विजयाचूर्णं सर्वचूर्णार्द्धसंयुतम् ।
सिता च द्विगुणा देया मोदकार्थं भिषग्वरैः ॥ ८ ॥
मध्वाज्यमिश्रितं कृत्वा कर्षमात्रं तु मोदकम् ।
प्रातश्च भक्षयेन्नित्यं सर्वव्याधिविवर्जितम् ॥ ९ ॥
शुद्ध अभ्रककी भस्म एक तोला, शुद्ध लोहभस्म ६ माशे, वङ्गभस्म ३ माशे एवं जावित्री, जायफल, त्रिकुटा, त्रिफला, नागरमोथा, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, सैंधानोन, भांगरा, जीरा, कालाजीरा, धनियाँ, गठिवन, वालछड, शतावर, कूठ, वंशलोचन, दाख, लौंग, खिरैंटी, कंघी, चव्य, देवदारु, अजवायन, सोया, कौंछके बीज, बेलगिरी, काकोली, क्षीरकाकोली, ताडके अंकुर, सुहागा, शालपर्णी, गोखरू, चीता, कुन्दुरु, मुरा, मांसी, पुनर्नवा, असगन्ध, मोचरस, गजपीपल, कायफल, ताडका मस्तक, मुलहठी, सौंफ, तालीशपत्र, अनन्तमूल, फूलप्रियंगु, सुगन्धवाला, सेमलकी मुशली, पिण्डखजूर, विदारीकन्द, पृश्निपर्णीकी जड, पद्माख, तालमखाने, मेथी, फालसे, लालचन्दन, काली मिरच, तिल, काकडासिंगी, धूपसरल, कपूर और सोंठ इन प्रत्येक औषधियोंका चूर्ण एक एक तोला और समस्त औषधियोंके चूर्णसे आधा भाग धीमें भुनाहुआ, भाँगका चूर्ण तथा मिश्री सम्पूर्ण चूर्णसे दुगुनी लेवे । सबोंको एकत्र कूट पीसकर और यथाविधि मिलाकर पकावे । जब उत्तम प्रकार पाक होजाय तब शीतल होनेपर घृत और शहदके योग से एक एक तोलेके लड्डू बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक लड्डू खावे और ऊपरसे सुखोष्ण दूध पीवे ॥ ९९-१०९ ॥
नानावर्णमतीसारं सङ्ग्रहग्रहणीहरम् ।
प्रमेहं च महाव्याधिं यक्ष्माणं क्षयमेव च ॥ ११० ॥
नारीशतं च रमते न च शुक्रक्षयो भवेत् ।
१३६४ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-
न तस्य लिङ्गशैथिल्यं वृद्धानां परमौषधम् ॥ ११ ॥ बल्यं वृष्यं वातहरं शुक्रस्य जननं परम् । नैतत्परतरं किञ्चिद्विद्यते वाजिकर्मसु ॥ १२ ॥ स्त्रीणां चैवानपत्यानां दुर्बलानां च देहिनाम् । ओजस्थिरकरं चैव स्त्रीषु कायविवर्द्धनम् ॥ १३ ॥ मृत्युसञ्जीवनीतन्त्रे पातअलमुनेर्मतम् । महाकामेश्वरो ह्येष बलपुष्टिविवर्द्धनः ॥ रोगानेताञ्जयेत्तेन महादेवेन निर्मितम् ॥ १४ ॥
इस औषधिके सेवनसे अनेक प्रकारके अतीसार, संग्रहणी, प्रमेह, यक्ष्मा, महाव्याधि, क्षयादि जैसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । मनुष्य सैंकड़ों स्त्रियोंको भोगे तो भी उसका वीर्य क्षय नहीं होता, और न उसके लिङ्गमें शिथिलता आती है । वृद्ध मनुष्योंको यह औषध परमोपयोगी है । यह बल, वीर्य और पुष्टिको करती है, वातविकारको हरती है । वाजीकरण औषधोंमें इससे श्रेष्ठ अन्य औषध नहीं है । बाँझस्त्रियों, दुर्बल मनुष्यों, नष्टवीर्य, अल्पवीर्य और वृद्धजनोंके यह औषध ओजकी वृद्धि और स्थिरताको करती है । एवं स्त्रियोंके शरीरकी वृद्धि करती है । मृत्युञ्जय तन्त्रमें लिखा हुआ यह महाकामेश्वरमोदक पातञ्जलिमुनिके मतसे अत्यन्त बल पुष्टिको करनेवाला है । यह इन सब रोगोंको जीतता है इसीसें महादेवजीने इसको निर्माण किया है ॥
श्रीमदनानन्दमोदक।
सूतौ गन्धस्तथा लौहं त्रिसमं शुद्धमभ्रकम् । कर्पूरं सैन्धवं मांसी धात्र्येला च कटुत्रयम् ॥ १५ ॥ जातीकोषफलं पत्रं लवङ्गं जीरकद्वयम् । यष्टीमधु वचा कुष्ठं हरिद्रा देवताडकम् ॥ १६ ॥ ऐजलं टङ्कणं भार्ङ्गी नागरं पुष्पकेशरम् । शृङ्गी तालीशपत्रं च द्राक्षाऽग्निर्देन्तिबीजकम् ॥ १७ ॥ बला चातिबला चोचं धनिकेभकणा शठी । सजलं जलदं गन्धा विदारी च शतावरी ॥ १८ ॥ अर्कौ वानरबीजं च गोक्षुरं वृद्धदारकम् । त्रैलोक्यविजयाबीजं समांशं पेषयेद्भिषक् ॥ १९ ॥
ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३६५
पारे और गन्धककी कज्जली दो तोले, लोहभस्म एकतोला, अभ्रकभस्म ३ तोले, एवं कपूर, सैंधानमक, वालछड, आमले, छोटीइलायची, सोंठ मिरच, पीपल, जावित्री, जायफल, तेजपात, लौंग, जीरा, कालाजीरा, मुलहठी, बच, कूट, हल्दी, देवदारु, हिज्जलके बीज, सुहागा, भारङ्गी, सोंठ, नागकेशर, काकडासिंगी, तालीशपत्र, शारव, चीता, दन्तीके बीज, खिरेंटी, कंघी, दारचीनी, धनियाँ, गजपीपल, कचूर, सुगन्धवाला, नागरमोथा, प्रसारणी, विदारीकन्द, शतावर, आककी जड, कौंछकें बीज, गोखुरू, विधारा और भाँगके बीज इन सब औषधियोंको समान भाग लैकर एकत्र कूटपीसकर बारीक चूर्ण करलेवे ॥ १५-१९ ॥
शतावरीरसं दत्त्वा श्लक्ष्णचूर्णं समाचरेत् ।
शाल्मलीमूलचूर्णं तु चूर्णादङ्घ्रिसममाहरेत् ॥ २२० ॥
चूर्णाद्र्धे विजयाचूर्णं विशुद्धं तत्र दापयेत् ।
सर्वमेकत्र संयोज्य च्छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ २१ ॥
मोदकार्थे सिता देया पाकयोग्या तथा मधु ।
नातिबाह्यं च धूमान्ते पाचयेन्मन्दवह्निना ॥ २२ ॥
चातुर्जातं सकर्पूरं सैन्धवं सकटुत्रयम् ।
सञ्चूर्ण्य च ततो देयं हव्यं किञ्चिन्निधापयेत् ॥
पाकं ज्ञात्वा कर्षमितं मोदकं परिकल्पयेत् ॥ २३ ॥
फिर उस चूर्णको शतावरके रसके साथ खरल करके धूपमें सुखाकर पुनर्वार चूर्ण करलेवे और उसमें सेमलकी मुशलीका चूर्ण उक्त औषधियोंके चूर्णसे चौथाई भाग एवं घीमें भुनीहुई भाँगका चूर्ण समस्त चूर्णसे आधाभाग मिलाकर सबको एकत्रितकर बकरीके दूधमें खरल करे । तदनन्तर सब औषधिसे दुगुनी मिश्रीको बकरीके दूधमें मिलाकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा पकावे। जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें उक्त समस्त चूर्ण डालदेवे । एवं चातुर्जातकचूर्ण, कपूर, सैंधा नोन और त्रिकुटा इनका चूर्ण दो दो तोले तथा किञ्चित् घृत और मधु डालकर सबको एकमएक करदेवे । जब उत्तम प्रकार पाक सिद्ध होजाय तब शीतल होनेपर एकएक तोलेके लड्डू बनालेवे ॥ २२०-२२३ ॥
भूतनाथे सुरपतौ रतिनाथे तथैव च ।
गणनाथे हुतभुजि मोदकाग्रं निवेदयेत् ॥
मूलमन्त्रं समुच्चार्य अर्पयेत्तु हुताशने ॥ २४ ॥
| ११६६ | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरणा- |
|---|
ततोऽभिमन्त्रणमन्त्रः ।
“ॐ ह्रीँ शाँ सः अमृतं कुरु कुरु अमृते अमृतोद्भवाय नमः ।
ह्रीँ अमृतं कुरु कुरु अमृतेश्वराय स्वाहा ॐ स्वाहा ॥”
इति मन्त्रेणाभिमन्त्रितं कृत्वा पात्रान्तरे स्थापयेत् ॥
काञ्चने राजते काचे मृद्भाण्डे वा निधापयेत् ॥ २५ ॥
प्रथम एक एक मोदक शिव, इन्द्र, गणेश और अग्नि आदि देवताओंके लियें उक्तमन्त्रको उच्चारण करके समर्पण करे । उल्लिखितमन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उन लड्डुओंको सुवर्ण, चाँदी, काँच अथवा मिट्टीके बर्त्तनमें भरकर रखदेवे ॥
प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा हरगौर्यौ प्रपूजयेत् ।
कालानलभवं बीजं सतिलं घृतसंयुतम् ॥
गव्यं क्षीरं सितायुक्तमनुपेयं च पायसम् ॥ २६ ॥
विलासाथ प्रदोषे च मोदकं परिसेवयेत् ।
त्रिसप्ताहप्रयोगेण कामान्धो जायते नरः ।
कामज्वरो भवेत्तावद्यावन्नारीं न गच्छति ॥ २७ ॥
“स सहस्रं वरारोहा रमयत्यपि सोद्गमः ॥ २८ ॥
न च लिङ्गस्य शैथिल्यं वेगवीर्यं विवर्द्धयेत् ।
प्रमदाप्राणबाहुल्यं मत्तवारणविक्रमः ॥ २९ ॥
वामावश्यकरो रम्य ऊर्ध्वंरेता भवेन्नरः ।
कामतुल्यं भवेद्रूपं स्वरः परभृतोपमः ॥ ३० ॥
खगतुल्या भवेद्दृष्टिर्वृद्धोऽपि तरुणायते ।
अष्टोत्तरं भवेद्यस्तु भवेत्तस्य सुखोपमम् ॥ ३१ ॥
अपस्मारज्वरोन्मादभयानिलगदापहम् ॥ ३२ ॥
कास श्वासं सशोथं च भगन्दरगुदामयम् ।
अग्निमान्द्यमतीसारं विविधं ग्रहणीगदम् ॥ ३३ ॥
बहुमूत्रं प्रमेहं च शिरोरोगमरोचकम् ।
हन्ति सर्वान् गदान्घोरान् वातपित्तबलासजान् ॥ ३४ ॥
वन्ध्या च मृतवत्सा च नष्टपुष्पा च या भवेत् ।
ऽधिकारः भाषाटीकासहिता । १३६७
बहुपुत्रा जीववत्सा भवेदस्य निषेवणात् ॥
हरते सूतिकारोगं वृक्षमन्द्राशनिर्यथा ॥ ३५ ॥"
इसके अनन्तर प्रतिदिन प्रातः काल शौच, स्नानादिसे पवित्र होकर शिव और पार्वतीका पूजन करे फिर काले चीतेके बीज और तिलोंके चूर्णको घृतमें मिलाकर तथा मिश्री मिलेहुए गोदुग्ध और खीर इनके अनुपानके साथ विलासके लिये सायङ्कालमें एकएक मोदक सेवन करे । इनको इक्कीसदिनतक सेवन करनेसे मनुष्य कामान्ध होजाता है और जबतक स्त्रीप्रसङ्ग नहीं करता तबतक उसको कामज्वर रहता है ॥ २६-२३५ ॥
मोदकं मदनानन्दं सर्वरोगे महौषधम् ।
वीर्यवृद्धिकरं श्रेष्ठं जरामृत्युविनाशनम् ॥
कथितं देवदेवेन रावणस्य हितार्थिना ॥ ३६ ॥
यह मदनानन्दमोदक सर्वप्रकारके रोगोंकी परमोत्कृष्ट औषधि है। इसके प्रतापसे बल, वीर्य और पुष्टि होती है तथा जरा और मृत्यु निवारण होती है। रावणके हितैषी श्रीमद्महादेवजीने इस योगको वर्णन किया है ॥ ३६ ॥
मृत्युसञ्जीवनी सुरा ।
नवं गुडं च संगृह्य शतमेकपलं तथा ।
बावरीत्वचमादाय बदरीत्वचमेव च ॥ ३७ ॥
प्रस्थं प्रस्थं प्रदातव्यं पूगं देयं यथोचितम् ।
लोध्रं च कुडवं दत्त्वा आर्द्रकं च पलद्वयम् ॥ ३८ ॥
तोयमष्टगुणं दत्त्वा गुडं संगोलयेत्सुधीः ।
प्रथमे चार्द्रकं दद्याद्द्वितीये वावरीत्वचम् ॥ ३९ ॥
तृतीये बदरीं दत्त्वा गोलयित्वा भिषग्वरः ।
मुखे शरावकं दत्त्वा यत्नात्कृत्वा च बन्धनम् ॥ २४० ॥
मुखसम्बन्धनं कृत्वा स्थापयेद्दिनविंशतिम् ।
मृन्मये मेहिकायन्त्रे मयूराख्येऽपि यन्त्रके ॥ ४१ ॥
यथाविधिप्रकारेण मन्दमन्देन वह्निना ।
चुल्लीमध्ये विधातव्यं मृत्तिकादृढभाजने ॥ २४२ ॥
तदौषधं च तन्मध्ये समुद्धृत्य विनिक्षिपेत् ।
नलं च युगलं दत्त्वा कुम्भौ च गजकुम्भवत् ॥ २४३ ॥