भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५ धिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३५५
इसके सेवनसे कफ, पित्त और वातजन्य रोग नष्ट होते हैं। यह मन्दाग्निमें सेवन करना हितकर है। कृश मनुष्योंको अत्यन्त पुष्टिकारक और उत्तम वाजीकरण है। जो पुरुष निरन्तर स्त्रियोंमें आसक्त होनेसे क्षीणवीर्य होगये हों और जो क्षयरोगसे ग्रसित हों उनका यह औषध परमोपयोगी है तथा खाँसी श्वास, ज्वर, हिचकी, वमन और अरुचि आदि विकारोंको नष्ट करती है । इस गुडकूष्माण्डनामक औषधको अश्विनीकुमारोंने वर्णन किया है। इसमें खण्डकूष्माण्डके समान आठ सेर पेठेको उबालकर रस बनावे ॥ ५२–५५ ॥
कामेश्वरमोदक।
धात्रीसैन्धवकुष्ठकट्फलकणाशुण्ठीयमानीद्वयं
यष्टीजीरकयुग्मधान्यकशठीशृङ्गीवचाकेशरम् ।
तालीशं त्रिसुगन्धिकं समरिचं पथ्याक्षमेभिः समं
चूर्णीकृत्य मनाक् स्वबीजसहितं भृष्टा तु शक्राशनम्॥५६॥
सर्वेषां द्विगुणां सितां सुविमलां यत्नाद्भिषङ् निक्षिपेत्
क्षौद्रं चापि घृतं प्रशस्तदिवसे कुर्याच्छुभान्मोदकान् ।
कर्पूरैरवचूर्णितानपि हितान्दत्त्वा तिलान्भर्जितान्
गोप्योऽयं क्षितिमण्डलेऽमितधिया पाखण्डिनामग्रतः॥५७॥
आमले, सैंधानमक, कूठ, कायफल, पीपल, सोंठ, अजवायन, अजमोद, मुलहठी जीरा, कालाजीरा, धनियाँ, कचूर, काकड़ासिंगी, वच, नागकेशर, तालीशपत्र, दारचीनी, इलायची, तेजपात, मिरच, हरड और बहेडा इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर बीजोंसहित भुनीहुई भाँगका चूर्ण सबकी बराबर और समस्त चूर्णसे दुगुनी मिश्री, शहद तथा घृत लेकर सबको यथाविधिसे पकावे । पश्चात् सुगन्धिके लिये कपूरका चूर्ण और भुनेहुए तिलोंका चूर्ण मात्रानुसार डालकर उत्तम मोदक बनालेवे । बुद्धिमान् वैद्योंको यह योग पाखण्डियोंसे गुप्त रखना चाहिये ॥ ५६ ॥ ५७ ॥
आधिव्याधिहरः परं क्षयहरः कुष्ठापहो बृंहणः स्त्रीणां
तोषकरो मुखद्युतिकरः शुक्राग्निवृद्धिप्रदः। कासश्वास-
बलासरो़गनिचयप्रध्वंसनः प्राणिनां प्रोक्तो ब्रह्मसुतेन
सर्वसुखदः कामेश्वरो मोदकः ॥ ५८ ॥ अहगणपरीहीनः
सर्वशास्त्रप्रवीणो ललितविमलकीर्तिः प्राप्तकन्दर्पमूर्त्तिः ।