भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३५६ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-
विगतसकलभीतिर्गीतवाद्याङ्गनीतिर्भवति भुवि स देवो येन भुक्तः प्रयत्नात् ॥ ५९ ॥
इसको शुभ दिनमें सेवन करनेसे मानसिक और शारीरिक सब विकार, क्षय और कुष्ठरोग दूर होते हैं। यह अत्यन्त बृंहण है । स्त्रियोंको प्रसन्न करनेवाला, मुखकी कान्ति, वीर्य और जठराग्निकी वृद्धि करनेवाला है । इससे खाँसी, श्वास और बलास आदि मनुष्योंके रोगसमूह नष्ट होते हैं । इस सर्वसुखदायी कामेश्वर-मोदकको भृगुजीने कहा है । जो मनुष्य इसको विधिपूर्वक सेवन करता है वह सम्पूर्ण ग्रहोंकी बाधासे मुक्त, सर्वशास्त्रोंमें कुशल, निर्मल कीर्त्तिवाला, कामदेवके समान रूपवाला, समस्त भयोंसे रहित, गीत वाद्यादिको जाननेवाला और देवताओंके समान होता है ॥ ५८ ॥ ५९ ॥
रहसि युवतिखेलासम्पुटाकर्षहर्षार्द्रमयति युवतीनां केलिकौतूहलेन । यदि कथमपि भुक्तो भोजनादा वथान्ते सुरतरभसमुच्चैर्नष्टकामं प्रकामम् ॥ १६० ॥ यस्मान्नव्यबृहस्पतिस्तनुधियो यस्मात्सदा वीर्यवान् यस्मादुन्मददाक्षिणात्ययुवतीसम्भोगकौतूहली । यस्मात्काव्यकुतूहली सुकविता सञ्जायते लीलया श्रीमद्भिः प्रतिवासरं क्षितितले संसेव्यतां मोदकः॥१६१॥
इसको सेवन करनेवाला बडे आनन्दसे स्त्रियोंमें रमण करता है । यदि इसको भोजनके आदि और अन्तमें सेवन करे तो सुरतसमय नष्ट हुआ काम फिर प्रबल होता है । जिससे मनुष्य बृहस्पतिके समान बुद्धिमान्, अत्यन्त वीर्यवान्, कामक्रीडा करनेमें चतुर, स्त्रियोंके साथ सम्भोगरूपी कुतूहल करनेवाला और सहजमें सुन्दर कविता तथा काव्य कुतुहलको प्राप्त होता है ऐसे मोदक श्रीमानोंको प्रतिदिन नियमसे सेवन करने चाहिये ॥ १६० ॥ १६१ ॥
अन्य कामेश्वरमोदक। चूर्णीशं गगनं घनार्द्धविमलं गन्धं च कुष्ठामृता मेथी मोचरसो विदारि मुषली गोक्षूरकं चेक्षुरः । भीरुं चैव कशेरुकं यम (मा) निका तालाङ्कुरं धान्यकं यष्टी नागबला तिला मधुरिका जातीफलं सैन्धवम् ॥६२॥