भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३५४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरणा-
यह सर्वप्रकारके भयङ्कर रोग, खाँसी, श्वास, क्षय, बवासीर अजीर्ण, अम्लपित्त, तृषा, वमन, मूर्च्छा और आठ प्रकारके शूल इत्यादि रोगोंको जीतता है। इस खण्डाभ्रकरसायनको ब्रह्माके पुत्र भृगुऋषिने कहा है। यह आयु और मेधाको बढानेवाला तथा सब पापोंको हरनेवाला है। ग्रह, राक्षस और पिशाचोंकी बाधा, अपस्मार, पाण्डुरोग, प्रमेह और मूत्रकृच्छ्रादि विकारोंको शीघ्र नष्ट करता है। इससे स्त्री पुरुषोंके और पुरुष स्त्रियोंके वशीभूत होजाता है यह हजारों बार परीक्षा-कर देखागया है इसमें सन्देह नहीं ॥
गुडकूष्माण्ड ।
कूष्माण्डात्पलशतं सुस्विन्नं निष्कुलीकृतम् ।
प्रस्थं च घृततैलस्य तस्मिंस्तप्ते निधापयेत् ॥ ४९ ॥
त्वक्पत्रधान्यकव्योषजीरकैलाद्वयानलम् ।
ग्रन्थिकं चव्यमातङ्गपिप्पलीविश्वभेषजम् ॥ १५० ॥
शृङ्गाटकं कसेरुं च प्रलम्बं तालमस्तकम् ।
चूर्णीकृतं पलाशं च गुडस्य तुलया पचेत् ॥
शीतीभूते पलान्यष्टौ मधुनः सम्प्रदापयेत् ॥ ५१ ॥
छीलकर उसीजे हुए पेठेके टुकडे १०० पल, घी और तिलका तेल एक एक प्रस्थ और पुराना गुड १०० पल लेवे । प्रथम उक्त पेठेके टुकडोंको सुखाकर घी तेलमें भूनलेवे, फिर सबको एकत्रकर पेठेके रसमें पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें दारचीनी, तेजपात, धनियाँ, त्रिकुटा, जीरा, दोनों तरहकी इलायची, चीतेकी जड, पीपलामूल, चव्य, गजपीपल, पीपल, साँठ, सिंघाडे, कसेरू खीरेके बीज और ताडका मस्तक ये प्रत्येक चार चार तोले चूर्ण कर डाल देवे और शितल होनेपर आठ पल शहद मिलाकर चिकने वासनमें भरकर रखदेवे ॥ १४९-१५१ ॥
कफपित्तानिलहरं मन्दाग्नौ च प्रशस्यते ।
कृशानां बृंहणं श्रेष्ठं वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ५२ ॥
प्रमदासु प्रसक्तानां ये च स्युः क्षीणरेतसः ।
क्षयेण च गृहीतानां परमेतद्भिषग्जितम् ॥ ५३ ॥
कासं श्वासं ज्वरं हिक्कां हन्ति च्छर्दिमरोचकम् ।
गुडकूष्माण्डकं ख्यातमश्विभ्यां समुदाहृतम् ॥ ५४ ॥
खण्डकूष्माण्डवत्पाच्यः स्विन्नकूष्माण्डकद्रवः ॥५५ ॥