भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1382, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें१३५० | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरगा-
जो पुरुष नित्यप्रति स्त्रीप्रसङ्ग करनेसे नष्टवीर्य्य होगया हो वह भी इसके सेवनसे अत्यन्त वीर्य्यवान्, महाबलवान् और बुद्धिमान् होता है इसमें कुछ सन्देह नहीं । इस रसको सात सप्ताह पर्यन्त सेवन करनेसे सब रोग नष्ट होते हैं एवं स्थूल पुरुषोंकी स्थूलता और कृश मनुष्योंकी कृशता दूर होकर शरीर पुष्ट होताहै॥१९-२१॥
स्वर्णसिंदूर ।
पलं रसेन्द्रस्य च गन्धकस्य हेम्नोऽपि कर्षं परिगृह्य सम्यक्। वटप्ररोहस्य रसेन यामं यामं विमर्द्याथ कुमारिकायाः ॥२२॥ तत्काचकूप्यां निहितं प्रयत्नात्पचेद्विधिज्ञः सिकताख्ययन्त्रे । ततो रजश्चोर्द्धगतं सुरम्यं प्रगृह्य यत्नादरुणप्रभं यत् ॥२३॥ तद्योजयेत्सर्वगदेषु वीक्ष्य धातुं बलं वह्निवृद्धिं वयश्च । रसायनं वृष्यतरं च बल्यं मेधाग्निकान्तिस्मरवर्द्धनं च ॥ २४ ॥
शुद्ध पारा एक पल, शुद्ध गंधक एक पल और सोना एक तोला लेवे । सबको एकत्र बडके अंकुरोंके रसमें एक प्रहरतक एवं घीग्वारके रसमें एक प्रहरतक खरल करे । फिर एक बोतलमें विधिपूर्वक बुद्धिमान् वैद्य उसको वालुकायंत्रमें पकावे । जब स्वयं शीतल होजाय तब सूर्योदयकी लाल लाल कान्तिके समान उस औषधिको बोतलमेंसे निकालकर पीस लेवे । इस स्वर्णसिन्दूरनामक रसको सब प्रकारके रोगोंमें विचारपूर्वक प्रयोग करे । यह रसायन धातु, बल, अग्नि और आयुकी वृद्धि, शरीरमें पुष्टि, वीर्य तथा बलकी वृद्धि करती है । मेधा, जठराग्नि और काम-शक्तिको प्रबल करती है ॥२१-२४॥
स्वल्पचन्द्रोदयमकरध्वज ।
जातीफलं लवङ्गं च कर्पूरं मरिचं तथा । प्रत्येकं तोलकं दत्त्वा सुवर्णस्य च माषकम् ॥ २५ ॥ अण्डजं माषमानं च सर्वतुल्यमथेश्वरम् । यत्नतो मर्दयेत्खल्ले चतुर्गुञ्जावटीं चरेत् ॥ २६ ॥ एष चन्द्रोदयो नाम रसो वाजीकरः परः । हन्ति रोगानशेषांश्च बलवीर्याभिवर्द्धनः ॥ २७ ॥
जायफल, लौंग, कपूर और कालीमिरच ये प्रत्येक एक एक तोला, सोना एक माश, कस्तूरी एक माशा और सब औषधोंके बराबर भाग रससिंदूर