भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता। १३५१
लेवे। सबको खरलमें रखकर उत्तम प्रकार मर्दन करे पश्चात् चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। यह स्वल्प चन्द्रोदयनामक रस अत्यन्त वाजीकरण,सर्वरोग नाशक, बल, वीर्य एवं अग्निवर्द्धक है। इसको माखन, मिश्री अथवा पानके रसके साथ सेवन करना चाहिये ॥ २६-२७ ॥
वृहच्चन्द्रोदयमकरध्वज ।
पलं मृदुस्वर्णदलं रसैन्द्रात्पलाष्टकं षोडश गन्धकस्य ।
शोणैः सुकार्पासभवैः प्रसूनैः सव विमर्द्याथ कुमारि-
काद्भिः ॥ २८ ॥ तत्काचकुम्भे निहितं सुगाढे मृत्क-
र्पटीभिर्दिवसत्रयं च । पचेत्क्रमाग्नौ सिकतारुययन्त्रे
ततो रजः पल्लवरागरम्यम् ॥ २९ ॥ संगृह्य चैतस्य पलं
पलानि चत्वारि कर्पूररजस्तथैव । जातीफलं सोषण-
मिन्द्रपुष्पं कस्तूरिकाया इह शाणमेकम् ॥ १३० ॥
सोनेके वरक चार तोले, शुद्ध पारा ३२ तोले, शुद्ध गन्धक ६४ तोले इनको एकत्र कर कज्जली बनावे, फिर लालवर्णकी वनकपासके फूलोंके रस और घीग्वारके रसमें खरल कर उसको कांचकी शीशीमें भर ऊपरसे कपरामटी करके धूपम सुखालेवे। पश्चात् उस बोतलको बालुकायन्त्रमें रखकर मृदु, मध्य और तीक्ष्ण इस क्रमसे तीन दिनतक अग्निदेवे। जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब उसमेंसे लालवर्णके कोमल पत्तोंके समान रमणीय भस्मको निकाललेवे। तदनन्तर यह भस्म चार तोले, कपूर १६ तोले एवं जायफल, त्रिकुटा, लौंग, कस्तूरी ये प्रत्येक चार चार माशे लेवे, सबको जलद्वारा एकत्र खरल कर गोलियाँ बनालेवे ॥ २८-१३० ॥
चन्द्रोदयोऽयं कथितोऽस्य वल्लो भुक्तोऽहिवल्लीदलमध्य-
वर्त्ती । मदोन्मदानां प्रमदाशतानां गर्वाधिकत्व श्लथ-
यत्यकाण्डे ॥ ३१ ॥ घृतं घनीभूतमतीव दुग्धं मृदूनि
मांसानि समस्तकानि । मांसात्रपिष्टानि भवन्ति पथ्या-
न्यानन्ददायीन्यपराणि चात्र ॥ ३२ ॥ वलीपलिताना-
शनस्तनुभृतां वयःस्तम्भनः समस्तगदखण्डनः प्रचुर-
रोगपञ्चाननः । गृहेऽपि गृहभूपतिर्भवति यस्य चन्द्रो-
दयः स पञ्चशरदर्पितो मृगदृशां भवेद्वल्लभः ॥ ३३ ॥