भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1384

१३५२ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-

इसको बृहच्चन्द्रोदयरस कहते हैं। इस रसको प्रतिदिन दो या तीन रत्ती प्रमाण ले पानमें रखकर सेवन करे । इसके सेवनसे मनुष्य सैकड़ों मन्दोन्मत्त स्त्रियोंके मदको असमयमें दूर करता है। इसपर घृत, खूब औटाकर गाढा हुआ दूध, मृदु मांस, अन्नके और पिष्ठीके बने पदार्थ एवं अन्यान्य सब प्रकारकें आनन्ददायक पथ्य पदार्थ हितकारी हैं। यह रस वली और पलितरोगको नष्ट करनेवाला, मनुष्योंकी आयुको स्थापन करनेवाला, समस्त रोगोंको नाश करनेके लिये मृत्युञ्जय है। यह चन्द्रोदय जिसके घरमें भी होता है वह घरका राजा होता है। वह मृगनयनी स्त्रियोंका प्यारा और कामदेवके गर्वको दूर करता है ॥ ३१-३३ ॥

खण्डाभ्रक ।

पक्वचूतरसद्रोणः पात्रं स्याच्छुद्धखण्डतः ।
घृतमर्द्धं ततो ग्राह्यं चतुर्थांशं च नागरम् ॥ ३४ ॥
तदर्द्धं मरिचं प्रोक्तं तदर्द्धां पिप्पली मता ।
तोयं खण्डसमं दद्यात्सर्वमेकत्र संस्थितम् ॥ ३५ ॥
विपचेन्मृन्मये पात्रे यदा दर्वीप्रलेपनम् ।
चूर्णान्येषां ततो दद्यात्पत्रं पलचतुष्टयम् ॥ ३६ ॥
ग्रन्थिकं चित्रकं मुस्तं धन्याकं जीरकद्वयम् ।
त्र्यूषणं जाति तालीशं चूर्णमेषां पलं पलम् ॥ ३७ ॥
त्वगेलाकेशराणां च प्रत्येकं च पलं तथा ।
सिद्धशीते च मधुनः प्रस्थं दत्त्वा विघट्टयेत् ॥
तत्सर्वमेकतः कृत्वा स्निग्धे भाण्डे निधापयेत् ॥ ३८ ॥

उत्तम प्रकार पकेहुए आमोंका रस ३२ सेर, मिश्री ८ सेर, गौका घी चार सेर, सोंठका चूर्ण दो सेर, मिरचोंका चूर्ण एक सेर, पीपलका चूर्ण आध सेर और जल आठ सेर लेवे । सबोंको मिट्टीके उत्तम पात्रमें एकत्रकर विधिपूर्वक पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होकर करछीसे लगने लगे तब उसमें तेजपात १६ तोले, गठिवन, चीतेकी जड, नागरमोथा, धनियाँ, जीरा, काला जीरा, त्रिकुटा, जायफल, तालीशपत्र, दारचीनी, छोटी इलायची और नागकेशर इन प्रत्येक औषधियोंको चार चार तोले ले बारीक पीसकर मिलादेवे । जब अच्छे प्रकार पकजाय तब उतारकर शीतल होजानेपर उसमें एकप्रस्थ शहद डालकर सबको एकमएक करके चिकने बर्तनमें भरकर रखदेवे ॥ ३४-३८ ॥