भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३६२ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-
स्त्रीणां चैवानपत्यानां दुर्बलानां च देहिनाम् ॥९७॥
क्लीबानामल्पशुक्राणां जीर्णानामल्परेतसाम् ।
ओजस्तेजः स्वरं बुद्धिमायुः प्राणं विवर्द्धयेत् ॥९८॥
इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल अथवा भोजनके समय एक एक तोला प्रमाण भक्षण करे और ऊपरसे चार तोले दूधका अनुपान करे । इसके सेवनसे सैंकडों स्त्रियोंके साथ रमण करनेपरभी वीर्य क्षय नहीं होता और न लिङ्ग शिथिल होता है। विशेषकर शुक्रकी वृद्धि होती है । क्षय, राजयक्ष्मा, पाँचप्रकारकी खाँसी, वातज, पित्तज, कफज और सन्निपातजनितरोग, अठारह प्रकारका कुष्ठ, वातरक्त, प्रमेह, श्लीपद, सूजन और सब प्रकारका अर्श, कोष्ठगत रोग एवं अन्यान्य भयंकर व्याधियोंको यह औषध इस प्रकार तत्काल नष्ट करता है जिस प्रकार विष्णुभगवान् असुरोंको तत्क्षण नाश करदेते हैं । वाजीकर्ममें इससे बढकर अन्य औषधि नहीं है । यह लक्ष्मी तथा कान्तिको बढाती है तथा वन्ध्या स्त्रियों, दुर्बल मनुष्यों, नपुंसक, अल्पवीर्य, वृद्ध जनों और क्षीणवीर्य पुरुषोंको अत्यन्त हितकारी, ओज, तेज, स्वर, बुद्धि, आयु और प्राणोंको बढाती है ॥ ९२–९८ ॥
महाकामेश्वरमोदक ।
यथोक्तं द्रव्यसंचूर्णं प्रयोज्यं मृतमभ्रकम् ।
गगनाद्धं शुद्धलौहंलौहार्द्धं वङ्गभस्मकम् ॥९९॥
जातीकोषफलं चैव तत्र संचूर्ण्य दापयेत् ।
त्रिकटु त्रिफला मुस्तं चातुर्जातकसैन्धवम् ॥२००॥
भृङ्गजीरकयुग्मं च धन्याकं ग्रन्थिपर्णकम् ।
मांसी शतावरी कुष्ठं तुगा द्राक्षा लवङ्गकम् ॥१॥
बलातिबलामूलं च चविका देवताडकम् ।
यमानी शतपुष्पा च मर्कटीबीजबिल्वयोः ॥२॥
काकोली क्षीरकाकोली तालांकुरसटङ्कणम् ।
शालपर्णी त्रिकण्टं च चित्रकं कुन्दुरुर्मुग ॥३॥
पुनर्नवाऽश्वगन्धा च मोचकं गजपिप्पली ।
कट्फलं तालमस्तं च यष्टीमधुकमेव च ॥४॥