भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३६३
मधूरिका च तालीशमनन्ता च प्रियङ्कुकम् ।
बालकं वृद्धदारं च शाल्मली पिण्डखर्जुरम् ॥ ५ ॥
विदारी पृश्निपर्ण्यंघ्रि पद्मकं क्षुरबीजकम् ।
मेथी परूषकं चैव चन्दनं मरिचं तिलम् ॥ ६ ॥
शृङ्गी सरलकाष्ठं च कर्पूरं विश्वभेषजम् ।
समभागानि चैतानि चूर्णमेषां प्रकल्पयेत् ॥ ७ ॥
शोधितं विजयाचूर्णं सर्वचूर्णार्द्धसंयुतम् ।
सिता च द्विगुणा देया मोदकार्थं भिषग्वरैः ॥ ८ ॥
मध्वाज्यमिश्रितं कृत्वा कर्षमात्रं तु मोदकम् ।
प्रातश्च भक्षयेन्नित्यं सर्वव्याधिविवर्जितम् ॥ ९ ॥
शुद्ध अभ्रककी भस्म एक तोला, शुद्ध लोहभस्म ६ माशे, वङ्गभस्म ३ माशे एवं जावित्री, जायफल, त्रिकुटा, त्रिफला, नागरमोथा, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, सैंधानोन, भांगरा, जीरा, कालाजीरा, धनियाँ, गठिवन, वालछड, शतावर, कूठ, वंशलोचन, दाख, लौंग, खिरैंटी, कंघी, चव्य, देवदारु, अजवायन, सोया, कौंछके बीज, बेलगिरी, काकोली, क्षीरकाकोली, ताडके अंकुर, सुहागा, शालपर्णी, गोखरू, चीता, कुन्दुरु, मुरा, मांसी, पुनर्नवा, असगन्ध, मोचरस, गजपीपल, कायफल, ताडका मस्तक, मुलहठी, सौंफ, तालीशपत्र, अनन्तमूल, फूलप्रियंगु, सुगन्धवाला, सेमलकी मुशली, पिण्डखजूर, विदारीकन्द, पृश्निपर्णीकी जड, पद्माख, तालमखाने, मेथी, फालसे, लालचन्दन, काली मिरच, तिल, काकडासिंगी, धूपसरल, कपूर और सोंठ इन प्रत्येक औषधियोंका चूर्ण एक एक तोला और समस्त औषधियोंके चूर्णसे आधा भाग धीमें भुनाहुआ, भाँगका चूर्ण तथा मिश्री सम्पूर्ण चूर्णसे दुगुनी लेवे । सबोंको एकत्र कूट पीसकर और यथाविधि मिलाकर पकावे । जब उत्तम प्रकार पाक होजाय तब शीतल होनेपर घृत और शहदके योग से एक एक तोलेके लड्डू बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक लड्डू खावे और ऊपरसे सुखोष्ण दूध पीवे ॥ ९९-१०९ ॥
नानावर्णमतीसारं सङ्ग्रहग्रहणीहरम् ।
प्रमेहं च महाव्याधिं यक्ष्माणं क्षयमेव च ॥ ११० ॥
नारीशतं च रमते न च शुक्रक्षयो भवेत् ।