भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1393

धिकारः ] 'भाषाटीकासहिता । १३६१


चन्दनं तगरं क्षारं प्रत्येकं कर्षसम्मितम् ।
आलोड्य त्रिसुगन्धेन कर्पूरेणाधिवासयेत् ॥
काञ्चने राजते पात्रे स्थाप्यमेतद्भिषग्वरैः ॥ ९१ ॥

शतावर, गोखुरू, खिंरेंटी, कंघी, कौंछके बीज, तालमखाने और विदारीकन्द इनको चार चार तोले लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर सब चूर्णसे चौगुना बीजसहित भाँगका चूर्ण और समस्त चूर्णसे आधा भाग भैंसका दूध, शतावरका रस भी दूधके ही बराबर भाग, विदारीकन्दका स्वरस १ प्रस्थ और मिश्री २०० पल लेवे । सबोंको यथाविधिसे एकत्र मिलाकर ताँबेके बर्त्तनमें पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें त्रिकुटा, त्रिफला, दन्तीकी जड, त्रिजातक सैंधानोन, कचूर, धनियाँ, सुगन्धवाला, नागरमोथा, कस्तूरी, दाख, वंशलोचन, जावित्री, जायफल, बालछड, तेजपात, गठिवन, सोया, चव्य, दारुहल्दी, फूलप्रियंगु, लौंग, धूपसरल, भूरिछरीला, कूट, चमेलीके फूल, अजवायन, कायफल, नागकेशर, मेथी, मुलहठी, देवदारु, सोंफ, तालिशपत्र, खजूर, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लालचन्दन, तगर और जवाखार ये प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष प्रमाण ले बारीक कूटपीसकर डालदेवे । पश्चात् दारचीनी, इलायची, तेजपात और कपूर इनका चूर्ण सुगन्धिके लिये डालकर सबको एकम एक करके उत्तम मोदक बनालेवे और उनको सोने या चाँदी अथवा मिट्टीके पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ ८३-१९१ ॥

प्रातर्भोजनकाले वा भक्षयेत्तु विचक्षणः ।
कर्षप्रमाणं कर्त्तव्यं क्षीरं चानु पिबेत्पलम् ॥९२॥
शतं भजेद्वरस्त्रीणां न च शुक्रक्षयो भवेत् ।
न तस्य लिङ्गशैथिल्यं शुक्रसञ्जननं परम् ॥९३॥
क्षयं चैव महाव्याधिं पञ्च कासांस्तुदुस्तरान् ।
वातजान्पैत्तिकांश्चैव कफजान्सान्निपातिकान् ॥९४॥
हन्त्यष्टादश कुष्ठानि वातरक्तादिकानि च ।
प्रमेहं श्लीपदं शोथं लक्ष्मीकान्तिविवर्द्धनम् ॥९५॥
सर्वांनर्शोगदान् हन्ति वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ।
व्याधीन्कोष्ठगतानन्याञ्जनार्दन इवासुरान् ॥९६॥
नातः परतरं श्रेष्ठं विद्यते वाजिकर्मसु ।

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