भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1392

१३६० भैषज्यरत्नावली [ वाजीकरणा- ]

सर्वर्तुपथ्यमथ सर्वसुखप्रदायि । वृष्यं वलीपलितहारि रसायनं स्याच्छ्रीमूलदेवकथितं परमं प्रशस्तम् ॥८२ ॥

इसके सेवनसे निरन्तर वीर्य्यकी वृद्धि होती है । मनुष्य हजारों स्त्रियोंको भोगता है तो भी उसका लिंग शिथिल नहीं होता बल्कि ऐरावत हाथीके समान दृढ और बलवान् होजाता है । अग्निके समान प्रदीप्त कान्ति, मोरके समान स्वर, घोडेके समान वेग और गरुडके समान दृष्टिशक्ति प्रबल होती है । यह मोदक अस्सी प्रकारके वातरोग, समस्तपित्तरोग, बीस प्रकारके कफरोगों एवं दुर्नामादि उल्लिखित सर्व प्रकारके रोगोंको तत्काल नष्ट करता है । अग्निको अत्यन्त प्रदीप्तकर पुरुष सन्तानको बढाता है । यह सर्व ऋतुओंमें सेवन करने योग्य सब प्रकारके सुखोंकों देनेवाला, वयवृद्धि और पुष्टिकारक, वली और पलितरोगसंहारक एवं परमोत्तम रसायन है । इसको श्रीमुलदेवजीने वर्णन किया है ॥ १७९-१८२ ॥

बृहच्छतावरीमोदक ।

शतावरी श्वदंष्ट्रा च बला चातिबला तथा । मर्कटीक्षुरबीजं च विदारीकन्दजं रजः ॥ ८३ ॥ एतानि समभागानि पलिकानि विचूर्णयेत् । तस्माच्चतुर्गुणं देयं त्रैलोक्यविजयारजः ॥ ८४ ॥ एतदेकीकृतं यावत्तदर्द्धं माहिषं पयः । तावन्मात्रेण दातव्यः शतावर्या रसस्तथा ॥ ८५ ॥ विदार्य्याः स्वरसप्रस्थं सिता पलशतद्वयम् । गोलयित्वा सितां चैव पात्रे ताम्रमये दृढे ॥ ८६ ॥ पाचयेत्पाकविद्वैद्यो मोदकं परमं हितम् । त्र्यूषणं त्रिफला दन्ती त्रिजातं सैन्धवं शठी ॥ ८७ ॥ धान्यकं बालकं मुस्तं कस्तूरी गोस्तनी तुगा । जातीकोषफलं मांसी पत्रं नागेन्द्रग्रन्थिकम् ॥ ८८ ॥ शतपुष्पा चवी दारु प्रियङ्गुं सलवङ्गकम् । सरलं शैलजं कुष्ठं जातीपुष्पं यमानिका ॥ ८९ ॥ कट्फलं केशरं मेथी मधुरं सुरदारु च । मिषिस्तालीशपत्रं च खर्जूरं रसगन्धकौ ॥ ९० ॥