भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1391

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३५९

कामाग्निसन्दीपनमोदक ।

कर्षो रसो गन्धकमभ्रकं च द्विक्षारचित्रे लवणानि पञ्च ।
शठी यमानीद्वयकीटहारी तालीशपत्राण्यपरं द्विकर्षम् ॥ ७५ ॥
जीरं चतुर्जातलवङ्गजातीफलं च कर्षत्रयमेवमन्यत् ।
सवृद्धदारं कटुकत्रयं च तथा चतुःकर्षमितं निबोध ॥ ७६ ॥
धन्याकयष्टीमधुरीकशेरुकर्षाः पृथक् पञ्च वरी विदारी ।
वरेभकर्णैभकणात्मगुप्ताबीजं तथा गोक्षुरबीजयुक्तम् ॥ ७७ ॥
सबीजपत्रेन्द्ररजः समानं समा सिता क्षौद्रघृतं च तुल्यम् ।
कर्षैकमिन्दोरथ मोदकं तत्कामाग्निसन्दीपनमेतदुक्तम् ॥ ७८ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रक, जवाखार, सज्जी, चीता, पाँचोंनमक, कचूर अजवायन, अजमोद, वायबिडङ्ग और तालीशपत्र ये प्रत्येक एक एक कर्ष, जीरा दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग, जायफल ये दो दो कर्ष, विधारेके बीज, त्रिकुटा प्रत्येक तीन तीन कर्ष धनियाँ, मुलहठी, सौंफ, कसेरू ये चार चार कर्ष, शतावर, विदारीकन्द, त्रिफला, हस्तिकर्ण, पलाशकीजड, गजपीपल, कौंछके बीज, गोखुरु ये प्रत्येक पाँच पाँच कर्ष एवं बीज और पत्तोंसहित भाँगका चूर्ण सब औषधियोंके चूर्णके बराबर भाग तथा सर्वोंकी बराबर मिश्री, शहद : और घी लवे । सबको विधिपूर्वक मन्द मन्द अग्निसे पकावे फिर उसमें एक कर्ष कपूर डालकर करछीसे सबको एकम एक करके मोदक बनालेवें । इस रसको कामाग्निसन्दीपन कहते हैं ॥७५-७८॥

वृष्यस्त्वतः परतरं सततं न दृष्ट एनं निषेव्य मनुजः प्रमदासहस्रम् ।
गच्छेत्र लिङ्गशिथिलत्वमवाप्नुयाच्च नागाधिपं विजयते बलतः प्रमत्तम् ॥ ७९ ॥
कान्त्या हुताशनमपि स्वरतो मयूरान् वाहं जवेन नयनेन महाविहङ्गम।
वातानशीतिमथ पित्तगदं समग्रं श्लेष्मोत्थविंशतिरुजः परमग्निमान्द्यम् ॥ १८० ॥
दुर्नामकामलभ गन्दरपाण्डुरोग मेहातिसारकृमिहृद्ग्रहणीप्रदोषान् ।
कासज्वरश्वसनपीनसपार्श्वशूलशूलामॢपित्तसहितांशिरोजान् समस्तान् ॥ ८१ ॥
हत्वा गदानपि च तत्पुमपत्यकारि