भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1390
१३५८भैषज्यरत्नावली ।[ वाजीकरणा-

कटुका मधुकं कुष्ठं लवङ्गं सारसैन्धवम् ।
यमानी चाजमोदा च जीवन्ती गजपिप्पली ॥ ६८ ॥
प्रत्येकं कर्षमेकं तु चूर्णितानि शुभानि च ।
कुडवार्द्धं पादशेषे मधुनः प्रक्षिपेत्तथा ॥
मृगाण्डजं सकर्पूरं यथालाभं विनिक्षिपेत् ॥ ६९ ॥

जब पाक पकते पकते अवलेहके समान गाढा होजाय तब उसमें आमले, जीरा, काला जीरा, नागरमोथा, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, कौंछके बीज, कंघी, ताडके अंकुर, कशेरू, सिंघाडे, त्रिकुटा, धनियाँ, अभ्रक, वङ्ग, हरड, दाख, काकोली, खजूर, तालमखाना, कुटकी, मुलहठी, कूठ, लौंग, सैंधानमक, अजवायन, अजमोद, जीवन्ती और गजपीपल इन प्रत्येक औषधोंके चूर्णको एक एक कर्ष डाल देवे । जब उत्तमप्रकार पाक पककर सिद्ध होजाय तब शीतल होजानेपर उसमें शहद ८ तोले और सुगन्धिके लिये किञ्चित् कस्तूरी तथा कपूर मिलाकर लड्डू बनालेवे ॥ ६६-६९ ॥

रतिवल्लभनामाऽयं सेव्यमानो महारसः ।
परमोजस्करो बल्यो वातव्याधिविनाशनः ॥ ७० ॥
वातपित्तहरो वृष्यो दृष्टिसन्दीपनः परः ।
पित्तश्लेष्मास्रपित्तघ्नो विषगुल्मज्वरापहः ॥ ७१ ॥
यापयत्येष मन्दाग्निं रोगाणां क्षयहेतुकः ॥ ७२ ॥
न भवेल्लिङ्गशैथिल्यं वृद्धानां पुष्टिवर्द्धनम् ।
कृशानां बृंहणं श्रेष्ठं वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ७३ ॥
यस्य गेहे सदा बह्व्यः पत्न्यः स्युः सुमनोहराः ।
तेन सेव्यः सदैवायं मोदको रतिवल्लभः ॥ ७४ ॥

यह रतिवल्लभनामक महारस उचित मात्रासे प्रतिदिन सेवन करना चाहिये । यह अत्यन्त ओजस्कर, बलकर, वातव्याधिनाशक, वात-पित्तहर, वृष्य, नेत्र-शक्तिवर्द्धक, पित्त, कफ, रक्तपित्त, विष, गुल्मज्वर, मन्दाग्नि और क्षयरोगोंको नाश करनेवाला है । इससे लिङ्गमें शिथिलता नहीं होती । यह वृद्ध मनुष्योंको भी पुष्ट करता है । कृश मनुष्योंको बृंहण और उत्तम वाजीकरण है । जिसके घरमें बहुतसी सुन्दरी स्त्रियाँ हों उसको यह रतिवल्लभमोदकरस निरन्तर सेवन करना चाहिये ॥ १७०-१७४ ॥