भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1397

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३६५


पारे और गन्धककी कज्जली दो तोले, लोहभस्म एकतोला, अभ्रकभस्म ३ तोले, एवं कपूर, सैंधानमक, वालछड, आमले, छोटीइलायची, सोंठ मिरच, पीपल, जावित्री, जायफल, तेजपात, लौंग, जीरा, कालाजीरा, मुलहठी, बच, कूट, हल्दी, देवदारु, हिज्जलके बीज, सुहागा, भारङ्गी, सोंठ, नागकेशर, काकडासिंगी, तालीशपत्र, शारव, चीता, दन्तीके बीज, खिरेंटी, कंघी, दारचीनी, धनियाँ, गजपीपल, कचूर, सुगन्धवाला, नागरमोथा, प्रसारणी, विदारीकन्द, शतावर, आककी जड, कौंछकें बीज, गोखुरू, विधारा और भाँगके बीज इन सब औषधियोंको समान भाग लैकर एकत्र कूटपीसकर बारीक चूर्ण करलेवे ॥ १५-१९ ॥

शतावरीरसं दत्त्वा श्लक्ष्णचूर्णं समाचरेत् ।
शाल्मलीमूलचूर्णं तु चूर्णादङ्घ्रिसममाहरेत् ॥ २२० ॥
चूर्णाद्र्धे विजयाचूर्णं विशुद्धं तत्र दापयेत् ।
सर्वमेकत्र संयोज्य च्छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ २१ ॥
मोदकार्थे सिता देया पाकयोग्या तथा मधु ।
नातिबाह्यं च धूमान्ते पाचयेन्मन्दवह्निना ॥ २२ ॥
चातुर्जातं सकर्पूरं सैन्धवं सकटुत्रयम् ।
सञ्चूर्ण्य च ततो देयं हव्यं किञ्चिन्निधापयेत् ॥
पाकं ज्ञात्वा कर्षमितं मोदकं परिकल्पयेत् ॥ २३ ॥

फिर उस चूर्णको शतावरके रसके साथ खरल करके धूपमें सुखाकर पुनर्वार चूर्ण करलेवे और उसमें सेमलकी मुशलीका चूर्ण उक्त औषधियोंके चूर्णसे चौथाई भाग एवं घीमें भुनीहुई भाँगका चूर्ण समस्त चूर्णसे आधाभाग मिलाकर सबको एकत्रितकर बकरीके दूधमें खरल करे । तदनन्तर सब औषधिसे दुगुनी मिश्रीको बकरीके दूधमें मिलाकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा पकावे। जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें उक्त समस्त चूर्ण डालदेवे । एवं चातुर्जातकचूर्ण, कपूर, सैंधा नोन और त्रिकुटा इनका चूर्ण दो दो तोले तथा किञ्चित् घृत और मधु डालकर सबको एकमएक करदेवे । जब उत्तम प्रकार पाक सिद्ध होजाय तब शीतल होनेपर एकएक तोलेके लड्डू बनालेवे ॥ २२०-२२३ ॥

भूतनाथे सुरपतौ रतिनाथे तथैव च ।
गणनाथे हुतभुजि मोदकाग्रं निवेदयेत् ॥
मूलमन्त्रं समुच्चार्य अर्पयेत्तु हुताशने ॥ २४ ॥