भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३६९

फिर उत्तम प्रकार सौजनकर उस सुराको उतार ले और प्रतिदिन धातु एवं अवस्थाके अनुसार मात्राकी कल्पना कर सेवन करे । इससे आरोग्यता, शरीरमें दृढता, बल, मेधा, अग्नि, स्मृति और वीर्यकी वृद्धि होतीहै । वातव्याधिका नाश होता है एवं अत्यन्त कामाग्नि दीपन होती है । नित्य दश स्त्रियोंको भोगे तो अधिक आनन्द उत्पन्न होता है । रणमें शीघ्र ही भीमसेनके समान तेज और पराक्रम उत्पन्न होता है । रणके उत्साहको बढानेवाली इससे बढकर अन्य कोई सुरा नहीं है । देवता और असुरोंके युद्धके समय शुक्राचार्यने इसको निर्माण किया था ॥ ४८-२५१ ॥

दशमूलारिष्ट ।

दशमूलानि कुर्वीत भागैः पञ्चपलैः पृथक् ।
पञ्चविंशत्पलं कुर्याच्चित्रकं पौष्करं तथा ॥ २५२ ॥
कुर्याद्विंशत्पलं लोध्रं गुडूची तत्समा भवेत् ।
पलैः षोडशभिर्धात्री रविसंख्यैर्दुरालभा ॥ ५३ ॥
खदिरो बीजसारश्च पथ्या चेति पृथक् पलैः ।
अष्टाभिर्गुणितं कुष्ठं मञ्जिष्ठा देवदारु च ॥ ५४ ॥
विडङ्गं मधुकं भार्गी कपित्थोऽक्षः पुनर्नवा ।
चव्यं मांसी प्रियङ्गुश्च सारिवा कृष्णजीरकम् ॥ ५५ ॥
त्रिवृता रेणुका रास्ना पिप्पली क्रमुकः शठी ।
हरिद्रा शतपुष्पा च पद्मकं नागकेशरम् ॥ ५६ ॥
मुस्तमिन्द्रयवं शुण्ठी जीवकर्षभकौ तथा ।
मेदा चान्या महामेदा काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके ॥ ५७ ॥
कुर्यात्पृथग् द्विपलिकान्पचेदष्टगुणे जले ।
चतुर्थांशं शृतं नीत्वा मृद्भाण्डे च निधापयेत् ॥ ५८ ॥

दशमूलकी प्रत्येक औषधि बीस बीस तोले, चीतेकी जड १०० तोले, पोहकर-मूल १०० तोले, लोध ८० तोले, गिलोय ८० तोले, आमले ६४ तोले, धमासा ४८ तोले, खैरसार, विजयसार और हरड प्रत्येक ३२-३२ तोले, कुठ, मञ्जीठ, देवदारु, वाँयविडंग, मुलहठी, भारंगी, कैथ, बहेडा, पुनर्नवा, चव्य, बालछड, फूल-प्रियंगु, अनन्तमूल कालाजीरा, निसोत, रेणुका, रास्ना, पीपल, सुपारी, कचूर,