भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1402

१३७० | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरणा-

हल्दी, सोया, पद्माख, नागकेशर, नागरमोथा, इन्द्रजौ, सोंठ; जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि और वृद्धि प्रत्येक औषधि आठ आठ तोले लेकर एकत्र कूट ले फिर सबको अठगुने जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर कपड छान करके शीतल होजानेपर उस क्वाथको मिट्टीके बर्त्तनमें भरकर रक्खे ॥

ततः षष्टिपलां द्राक्षां पचेन्नीरे चतुर्गुणे ।
त्रिपादशेषं शीतं च पूर्वक्वाथे शृतं क्षिपेत् ॥ ६९ ॥
द्वात्रिंशत्पलिकं क्षौद्रं दद्याद् गुडचतुःशतम् ।
त्रिंशत्पलानि धातक्याः कक्कोलं जलचन्दनम् ॥२६०॥
जातीफलं लवङ्गं च त्वगेलापत्रकेशरम् ।
पिप्पली चेति संचूर्ण्य भागैर्द्विपलिकैः पृथक् ॥ ६१ ॥
शाणमात्रां च कस्तूरीं सर्वमेकत्र निक्षिपेत् ।
भूमौ निखातयेद्भाण्डं ततो जातरसं पिबेत् ॥
कतकस्य फलं क्षिप्त्वा रसं निर्मलतां नयेत् ॥२६२॥

फिर दाखको ६० पल लेकर चौगुने जलमें पकावे, तृतीयांश जल शेष रहनेपर उसको उतारकर वस्त्रमें छान शितल करके पूर्व क्वाथमें मिलादेवे । पश्चात् उसमें शहद ३२ पल, गुड ४० पल, धायके फूल ३० पल, कंकोल, सुगन्धवाला, लालचन्दन, जायफल, लौंग, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर और पीपल इनके आठ आठ तोले चूर्णको बारीक पीसकर एवं चार माशे कस्तूरीको डालकर सबको चलादेवे । फिर उस पात्रका मुंह अच्छे प्रकार बन्दकर पृथ्वीमें गाडदेवे । एक महिनेके पीछे जब उसमें रस उत्पन्न होगया हो तब निर्मलीके फलोंका चूर्ण डालकर रसको नितार लेवे । इस रसको प्रतिदिन उचित मात्रासे सेवन करे ॥ ६९-२६२ ॥

ग्रहणीमरुचिं शूलं श्वासं भगन्दरम् ।
वातव्याधिं क्षयं छर्दिं पाण्डुरोगं च कामलाम् ॥६३॥
कुष्ठान्यर्शांसि मेहांश्च मन्दाग्निमुदराणि च ।
शर्करामश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं धातुक्षयं जयेत् ॥ ६४ ॥
कृशानां पुष्टिजननो वन्ध्यानां पुत्रदः परः ।
अरिष्टो दशमूलाख्यस्तेजःशुक्रबलप्रदः ॥२६५॥