भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता। ११५

तोले रस डालकर इस प्रकार बारह दिनतक उत्तम प्रकारसे खरल करे॥५७-१६०॥

ततः पारदमानं तु दत्त्वा त्रिकटुगुण्डकम् । वटिकां राजिकातुल्यां छायाशुष्कां समाचरेत् ॥ ६१ ॥ ततः शम्बुकजे पात्रे कर्त्तव्यावटिका त्वियम् । शरावे शङ्खपात्रे वा कृत्वा सलिलगोलितम् ॥ ६२ ॥ अत्यन्तदोषदुष्टाय ज्ञानशून्याय रोगिणे । ऊर्ध्वयोनिं समभ्यर्च्य प्रदद्याद्वटिकाद्वयम् ॥ ६३ ॥ ढक्कयेत्तं ततः पश्चाद्नरं स्थूलपटादिभिः । मलमूत्रागमात्सद्यः स साध्यो भवति द्रुतम् ॥ ६४ ॥

फिर उसमें चार माशे त्रिकुटका चूर्ण मिलाकर राईकी बराबर गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे। इन गोलियोंमेंसे दो दो गोली लेकर घोंघा, शंख, सीप या शराव (सकोरा) में रखकर, जलमें घोलकर और ब्रह्माका यथाविधि पूजन करके रोगीको सेवन करावे। जिस सन्निपातज्वरमें रोगीके वातादि दोष अत्यन्य दुष्ट होगये हों और जो बिलकुल ज्ञानशून्य हो ऐसे रोगीको यह औषध सेवन कराकर तत्काल मोटा और गरम कपडा उढाकर ढकदेवे। इसके पश्चात् यदि रोगी शीघ्रही मलमूत्रका त्याग करे तो उसको साध्य समझना चाहिये ॥ ६१-६४ ॥

दध्यन्नं तु ततो दद्यात्पिबेद्वारि यथेच्छया । दद्याद्वातहरं तैलमभ्यङ्गाय सदैव हि ॥ चिरज्वरे पिबेद्वारि पञ्चमूलीप्रसाधितम् ॥ ६५ ॥ ग्रहण्यां रक्तपाते च पिबेदतिविषां गदी । पिबेत् पर्पटजं वारि घोरे कम्पज्वरे तथा ॥ तथा ज्वरातिसारे च जीरकस्य जलं पिबेत् ॥ ६६ ॥ मन्दाग्नौ कामलायां च संग्रहग्रहणीगदे । कासे श्वासे सदा कार्या पानीयवटिका त्वियम् ॥ ६७ ॥

तदनन्तर रोगीको दहीभातका भोजन और यथेच्छ जलपान करावे। तथा वातनाशक महानारायणादि तेलोंकी शरीरपर मालिश करावे। इसपर पुराने