भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ११७
भाण्डिका ( वङ्गदेशप्रसिद्ध बडभाँट ), मण्डूकपर्णी, पीपल, गजपीपल, गूमा, मकोय, घुँघुची, कुकुरभाँगरा, मदनमाली ( एक प्रकारका सुगन्धितपुष्प ), आसारण, स्वर्णधतूरा, भाँग और श्वेत अपराजिता इन समस्त औषधियोंके रसको एक एक कर्ष परिमाण लेकर प्रत्येकके रसको क्रमसे पत्थरके खरलमें डालकर लोहेकी मूसलीसे खरल करे । फिर सबको प्रचण्ड धूपमें सुखाकर उसमें थूहरका दूध, आकका दूध, और बड़का दूध प्रत्येक एक एक कर्ष डालकर अच्छेप्रकारसे मर्दन करके गोलासा बनालेवे । इसके पश्चात् उसमें निम्नलिखित औषधियोंको खूब बारीक पीसकर कपड़छान करके डाले ॥ ६८–७६ ॥
दग्धहीरं चातिविषां कोचिलामभ्रकं तथा ।
पारदं शोधितं चैव गन्धकं विषमाधुरम् ॥ ७७ ॥
हरितालं विषं चैव माक्षिकं च मनःशिला ।
प्रत्येकं च चतुर्माषं सर्वं चूर्णीकृतं च तत् ॥ ७८ ॥
प्रक्षिप्य मर्दयेत्सर्वं शोषयित्वा पुनः पुनः ।
सुमर्द्दितं च तद् दृष्ट्वा चाङ्गेरीस्वरसेन च ॥ ७९ ॥
उत्थाप्य भेषजं दृष्ट्वा यदा पिण्डत्वमागतम् ।
तिलप्रमाणा गुटिकाः कारयेन्मतिमान् भिषक् ॥ १८० ॥
हीरेकी भस्म, अतीस, कुचला, अभ्रकभस्म, शुद्ध पारे और शुद्ध गन्धककी कज्जली, शुद्ध मीठातेलिया, हरताल, सर्पविष, सोनामाखी और मैनसिल, इन सबको चार चार माशे परिमाण मिलाकर बारम्बार खरलकरे और धूपमें सुखावे । जब औषधि उत्तमप्रकारसे घुटकर तैयार होजाय तब उसको चूका शाकके रसमें घोटे । घुटते २ जब उसका गोलासा बनजाय तब उसकी तिलकी बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ ७७–१८० ॥
त्रिदोषजनितो वैद्यमुक्तोऽपि बहुसम्मतः ।
लंघनैर्वालुकास्वेदैः प्रक्रान्तो दीनदर्शनः ॥ ८१ ॥
सम्पूज्य करुणाधारं प्रणम्य च खसर्पणम् ।
शरावे वारिणा घृष्ट्वाऽऽविंशतिं वटिकां पिबेत् ॥ ८२ ॥
पीतं तद्भेषजं पश्चाद्वस्त्रैराच्छादयेन्नरम् ॥
रसलग्नं वपुर्ज्ञात्वा दद्याद्वारि सुशीतलम् ॥ ८३ ॥