भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १२५


शुद्ध पारा, शुद्धगन्धक, अभ्रकभस्म और शुद्ध मीठातेलिया चारों ओषधियोंको समान भाग लेकर मुसलीके रसमें तीन दिनतक खरल करे । फिर उसको आतसी शीशीमें भरकर उसके ऊपर मुद्रा करके धूपमें सुखावे । तदनन्तर सातवार कपड़मिट्टी करे और प्रत्येक बार धूपमें सुखावे । फिर पुटपाक करे और स्वांगशीतल होनेपर ओषधिको शीशीमेंसे निकालकर एक दिनतक खरल करे । इसके पश्चात् कालाजीरा, जीरा, हींग, सज्जी, सुहागा, गोपीचन्दन ( सौराष्ट्रदेशकी मिट्टी ), गूगल, पाँचोंनमक, जवाखार, अजवायन, मिरच और पीपल ये प्रत्येक ओषधि पारेकी बराबर लेकर इनके क्वाथमें पृथक् पृथक् सात सात बार भावना देदेकर धूपमें सुखावे ॥ १९-२२३ ॥

नागवल्लीदलयुतं पंचगुञ्जं रसेश्वरम् । दद्यान्नवज्वरे तीव्रे सोष्णं वारि पिबेदनु ॥ २४ ॥ प्राणेश्वरो रसो नाम सन्निपातप्रकोपनुत् । शीतज्वरे दाहपूर्वे गुल्मशूले त्रिदोषजे ॥ २५ ॥ वाञ्छितं भोजनं दद्यात्कुर्याच्चन्दनलेपनम् । तापोद्रेकस्य शमनं बलाधिष्ठानकारकम् ॥ भवेन्नैवात्र सन्देहः स्वास्थ्यं च लभते नरः ॥ २६ ॥

इस रसको अत्यन्त उग्र नवीनज्वरमें पाँच रत्ती परिमाण पानमें रखकर सेवन करावे और ऊपरसे मन्दोष्ण जल पान करावे । यह प्राणेश्वर नामक रस सन्निपातके प्रकोपको शीघ्र नष्ट करता है । जिस ज्वरमें पहले दाह होकर फिर शीतका प्रकोप हो उस ज्वरमें तथा गुल्म, शूल और अन्यान्य त्रिदोषजनित रोगोंमें यह प्राणेश्वर रसही सेवन कराना चाहिये । इसको सेवन करानेके पश्चात् रोगीको यथेच्छ भोजन देवे और उसके शरीरपर चन्दनादिका प्रलेप करावे । इससे तापका उद्रेक शान्त होता है और बलकी वृद्धि होती है । इसके द्वारा मनुष्य निस्सन्देह आरोग्यलाभ करता है ॥ २२४-२२६ ॥

सन्निपातभैरव ।

पारदं गन्धकं तालं वत्सनाभं त्रिभिः समम् । दारुमूषं च गरल सर्वस्य समहिङ्गुलम् ॥ २७ ॥ मुद्गप्रमाणां वटिकां कारयेत्कुशलो भिषक् । सन्निपाते वटीमेकामाईद्रावैः प्रदापयेत् ॥ रसो महाप्रभावोऽयं सन्निपातस्य भैरवः ॥ २८ ॥