भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १३१
करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इन गोलियोंको रोगीकी अवस्था और बलाबलका विचार करके उपयुक्त मात्रासे सेवन कराना चाहिये। यह रस अत्यन्त दारुण सन्निपातज्वरको भी नष्ट कर देता है। इसपर शालिधानोंके चावलोंका भात और दहीका पथ्य देना चाहिये और पूर्ववत् शीतोपचार करना चाहिये। यह रस पृथ्वीपर अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ २५४-२६१ ॥
त्रैलोक्यचिन्तामणिरस ।
रसभस्म त्रयो भागा द्विभागं च भुजङ्गमम् ।
कालकूटं च षड्भागं भागैकं तालकं तथा ॥ ६२ ॥
गोदन्तं गगनं तुत्थं शिलागन्धकटङ्कणम् ।
जयपालोन्मत्तदन्ती करबीजं च लाङ्गली ॥ ६३ ॥
पलाशमूलजैर्नीरैः सप्तधा भावितं दृढम् ।
चित्रमूलकषायेण चार्द्रकस्य च वारिणा ॥ ६४ ॥
मात्स्यमाहिषमायूरच्छागवाराहडौण्डुभम् ।
प्रत्येकं दशधा मर्द्यं शिलाखण्डे च संक्षयात् ॥
धान्यद्वयां वटीं कृत्वा शुद्धवस्त्रेण धारयेत् ॥ ६५ ॥
रससिन्दूर ३ तोले, काले साँपका विष २ तोले, वत्सनाभ विष ६ तोले, हरताल १ तोला, गोदन्ती हरताल, अभ्रकभस्म, तूतिया, मैनसिल, गन्धक, सुहागा, जमालगोटा, धतूरेके बीज, दन्तीकी जड, कनेरकी जड और कलिहारीकी जड़ ये प्रत्येक ओषधि एक एक तोला लेवे। सबको एकत्र कूटपीस कर ढाककी जडके क्वाथमें सातबार भावना दे और खरल करे। फिर चीतेकी जडके काढ़ेमें और अदरखके रसमें तथा रोहूमछली, भैंसा, मोर, बकरा, सूअर और जलसर्प इन प्रत्येकके पित्तमें क्रमसे दस दस बार भावना देवे। पश्चात् पत्थरके खरलमें उत्तमप्रकारसे खरल करके दो दो धानकी बराबर गोलियाँ बनाकर और सुखाकर स्वच्छवस्त्रमें बाँधकर रखदेवे ॥ ६२-६५ ॥
दातव्यं चानुपानेन नारिकेलोदकेन च ।
ताम्बूलं च ततो दद्याद् भक्ष्यं शीतोपचारकम् ॥ ६६ ॥
तिलतैलै सदा स्नानं घृतमत्स्यादिभोजनम् ।
शीताम्लदधिसंयुक्तं पुराणान्नं च भक्षयेत् ॥ ६७ ॥