भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३२ | भैषज्यरत्नावली । [ रस-
इनमेंसे एक गोली नारियलके जलके साथ रोगीको सेवन कराकर ऊपरसै ताम्बूल भक्षण करावे । औषध सेवन करानेके पश्चात् रोगीके शरीरपर तिलके तेलकी मालिश कराकर शीतल जलसे स्नान करावे । इसके अतिरिक्त अन्यान्य शीतल उपचार करे । एवं घृत, मत्स्य, अम्ल, शीतल और दहिसहित पुराने चावलोंका भात इत्यादि पदार्थोंका भोजन करावे । इस प्रकार इस रसके सेवनसे सन्निपातज्वर दूर होता है ॥ ६६ ॥ ६७ ॥
रसेश्वर ।
रसेन गन्धं द्विगुणं गृहीत्वा तत्पादतुल्यं रविहेमतालम् ।
भस्मीकृतं योजय मर्दयेत्तु दिनत्रयं वह्निरसेन घर्मे ॥ ६८ ॥
विषं च दत्त्वाऽत्र कलाप्रमाणमजादिपित्तैः परिभावयेच्च ।
रक्तिद्वयं चास्य ददीत वह्निकटुत्रयेणार्द्ररसप्रयुक्तम् ॥ ६९ ॥
पारा ४ तोले, गन्धक ८ तोले, ताम्रभस्म १ तोला, स्वर्णभस्म १ तोला और हरतालभस्म १ तोला इन सबको चीतेके रसमें तीन दिनतक खरलकरके धूपमें सुखालेवे । फिर उसमें समस्त औषधिसे १६ वां भाग शुद्ध वत्सनाभ मिलाकर बकरा, मछली, भैंसा, मोर और सूअर इन पांचोंके पित्तमें क्रमसे भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एकएक गोली चीतेकी जडके क्वाथ, त्रिकुटेके क्वाथ और अदरखके रसमें मिलाकर रोगीको सेवन करावे ॥ ६८ ॥ ६९ ॥
तैलेन चाभ्यक्तवपुश्च कुर्यात्स्नानं जलेनैव सुशीतलेन ।
यावद्भवेद्दुःसहमस्य शीतं मूत्रं पुरीषं च शरीरकम्पः ॥ ७० ॥
पथ्यं यदीच्छा परिजायतेऽस्य मरीचखण्डं दधिभक्तकं च ।
अल्पं ददीतार्द्रकमत्र शाकं दिनाष्टकं स्नानमिदं च पथ्यम् ७१
औषधसेवनके पश्चात् रोगीके शरीरपर तेलकी मालिश कराकर इस प्रकार शीतल जलसे स्नान करावे, जिससे रोगीको असह्य शीत, शरीरमें कम्प और मूत्र व पुरीषके त्यागनेकी स्वाभाविक प्रवृत्ति हो । फिर रोगीकी इच्छानुसार
१ रसेश्वरांदयः कालमेघान्ता रसा वातोल्वणे संनिपाते प्रयोज्या इति रत्नकौमुद्यां माधवः ॥
रसेश्वररससे लेकर त्रिदोषदावानल कालमेघ रसतक जितने रस वर्णन कियेगये हैं वे वैद्योको वातोल्बण-संनिपातज्वरमें प्रयोग करने चाहिये । ऐसा श्रीमाधवाचार्यने अपनी "रत्नकौमुदी" में कहा है ॥