भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३४ , भैषज्यरत्नावली [ रस-
जैपालात्सार्द्धशतकं सर्वं संचूर्ण्य मर्दयेत् । मात्स्यमाहिषमायूरच्छागपित्तैर्विभावयेत् ॥ ७७ ॥ वटिकां शीततोयेन कुर्याद् गुञ्जाप्रमाणतः । वडवानलनामाऽयं नारिकेलजलेन वै । भक्षयेत्सन्निपातार्त्तो मृत्युस्तस्यान्मुखी भवेत् ॥ ७८ ॥
पारा, गन्धक, हरताल, मैनसिल, अभ्रक, वत्सनाभ, सोमल विष, कृष्णसर्पक-विष ये प्रत्येक एक एक तोला और जमालगोटे १५० तोले लेकर सबका एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर रोहमछली, भैंसा, मोर और बकरा इनके पित्तमें क्रमसे भावना देकर शीतल जलके साथ खरलकरके एकएक रत्तीकी गोलियां बनालेवे । इसकी एक एक गोली नारियलके जलके साथ सन्निपातरोगीको सेवन करानेसे उसकी मृत्युतक दूर हो जाती है ॥ ७६-७८ ॥
सन्निपातवडवानलरस
रसोऽष्टावमृतं सप्त स्यात्षष्ठो गन्धतालयोः । दन्तीबीजानि षड् भागाः पञ्चभागं तु टङ्कणम् ॥ ७९ ॥ चत्वारि धूर्त्तबीजस्य व्योषस्य त्रितयो भवेत् । एतानि वह्निमूलस्य क्वाथेन परिमर्दयेत् ॥ ८० ॥ आर्द्रकस्य रसेनाथ देयं गुञ्जाद्वयं हितम् । वडवानलसंज्ञोऽयं सन्निपातहरः परः ॥ ८१ ॥
पारा ८ भाग, वत्सनाभ विष ७ भाग, गन्धक ६ भाग, हरताल ६ भाग, जमाल-गोटे ६ भाग सुहागा ५ भाग, धतूरेके बीज ४ भाग और त्रिकुटा ३ भाग इन सबको चीतेकी जडके काढ़ेमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियां बनालेवे । इनमेंसे एक एक गोली अदरखके रसके साथ सेवन करावे । यह वडवानलरस सन्निपातज्वरको हरनेके लिये परमोपयोगी है ॥ ७९-८१ ॥
स्वच्छन्दनायकरस ।
सूतगन्धकलौहानि रौप्यं सम्मर्दयेत् त्र्यहम् । सूर्यावर्त्तश्च निर्गुण्डी तुलसी गिरिकर्णिका ॥ ८२ ॥ अग्निवल्ल्यार्द्रकं वह्निर्विजया जयया सह । काकमाचीरसैरेषां पञ्चपित्तैश्च भावयेत् ॥ ८३ ॥