भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] . भाषाटीकासहिता । १३५
अन्धमूषागतं पश्चाद्वालुकायन्त्रगं दिनम् ।
विपचेच्चूर्णितं खादेन्माषैकं चार्द्रकद्रवैः ॥ ८४ ॥
निर्गुण्डीदलमूलानां कषायं सोषणं पिबेत् ।
अभिन्यासं निहन्त्याशु रसः स्वच्छन्दनायकः ॥
छागीदुग्धेन मुद्गं च पथ्यमत्र प्रयोजयेत् ॥ ८५ ॥
पारा, गन्धक, लोहा और चाँदीकी भस्म इनको समानभाग लेकर तीन दिनतक खरल करे. फिर हुलहुल, सिम्हालू, तुलसी, अपराजिता (विष्णुकान्ता), श्वेतचीतेकी जड, अदरख, लालचीतेकी जड, भांग, अरणी, मकोय इन औषधियोंके रसोंकी और पाँचों पित्तोंकी क्रमसे एक एक दिनतक भावना देवे। पश्चात् उसको अन्धमूषामें बन्दकरके एक दिनतक वालुकायन्त्रमें पकावे । सांगशीतल होनेपर औषधिको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको एकएक माशे परिमाण अदरखके रसके साथ सेवन कर ऊपरसे सिम्हाळूके पत्तों और जडके क्वाथमें कालीमिरचोंका चूर्ण डालकर पान करे । यह रस अभिन्यासज्वरको शीघ्र नष्ट करता है । इसपर बकरीका दूध और मूँगकी दालके यूषका पथ्य देना चाहिये ॥ ८२-८५ ॥
सिंहनाद रस ।
लौहपात्रगते गन्धे द्राविते तत्र निक्षिपेत् ।
शुद्धसूतं समं चाभ्रं भार्गीद्रावं तयोः समम् ॥ ८६ ॥
निर्गुण्ड्याः पल्लवोत्थं च तुल्यं तुल्यं प्रदापयेत् ।
पचेन्मृद्वग्निना तावद्यावच्छुष्कं द्रवं द्वयम् ॥ ८७ ॥
विषपादयुतः सोऽयं सिंहनादरसोत्तमः ।
गुञ्जामात्रः प्रदातव्यः सन्निपातज्वरान्तकः ॥
अनुपानं पिबेद् व्याघ्रीक्वाथं पुष्करचूर्णितम् ॥ ८८ ॥
दो तोले गन्धकको लोहेके पात्रमें अग्निपर पिघलाकर उसमें शुद्ध पारा २ तोले, अभ्रक २ तोले, भार्गीका रस ४ तोले और निर्गुण्डीके पत्तोंका रस ४ तोले डालकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । पकते २ जब सब रस शुष्क होजाय तब नीचे उतारकर उसमें ३ माशे शुद्ध मीठा तेलिया मिलाकर खूब बारीक चूर्ण करलेवे । इस रसको एकएक रत्ती परिमाण देना चाहिये और इसपर पुहकरमूलका चूर्ण डालकर कटेरीका क्वाथ पान कराना चाहिये । यह सिंहनाद रस सन्निपातज्वरको नष्ट करनेके लिये अत्युत्तम है ॥ ८६-८८ ॥