भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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१३६ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-


स्वल्पकस्तूरीभैरव रस ।

हिङ्गुलं च विषं टङ्कं जातीकोषफलं तथा ।
मरिचं पिप्पली चैव कस्तूरी च समांशिका ॥
रक्तिद्वयं ततः खादेव सन्निपाते सुदारुणे ॥ ८९ ॥

सिंगरफ, वत्सनाभ विष, सुहागा, जावित्री, जायफल, मिरच, पीपल और कस्तूरी इन सबको समान भाग लेकर जलके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। दारुण सन्निपातज्वरमें इसकी एकएक गोली सेवन करनेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ८९ ॥

मध्यमकस्तूरीभैरव रस ।

मृगमदशशिसूर्या धातकी शूकशिम्बी
कनकरजतमुक्ता विद्रुमं लौहपाठाः ।
कृमिरिपुघनविश्वावारितालाभ्रधात्री-
रविदलरसपिष्टः कस्तूरीभैरवोऽयम् ॥ २९० ॥
कस्तूरीभैरवः ख्यातः सर्वज्वरविनाशनः ।
आर्द्रकस्य रसैः पेयो विषमज्वरनाशनः ॥ ९१ ॥
द्वन्द्वजान्भौतिकान्वापि ज्वरान्कामादिसम्भवान् ।
अभिचारकृतांश्चैव तथा शत्रुकृताञ्ज्वरान् ॥
निहन्याद्भक्षणादेव डाकिन्यादियुतांस्तथा ॥ ९२ ॥

कस्तूरी, कपूर, ताँबा, धायके फूल, कौंचके बीज, सोना, चाँदी, मोती, मूँगा, लोहा, पाठ, वायविडंग, नागरमोथा, साँठ, सुगन्धवाला, हरताल, अभ्रक और आमले इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके आकके पत्तोंके रसमें खरल करलेवे। इस प्रकार यह कस्तूरीभैरवरस सिद्ध होता है। यह सर्वप्रकारके ज्वरोंको नष्ट करनेवाला है। इसको एक एक रत्ती परिमाण अदरखके रस और मधुमें मिलाकर सेवन करनेसे विषमज्वर दूर होता है। एवं द्वन्द्वज, त्रिदोषज, कामक्रोधादिजनित, अभिचारकृत, शत्रुकृत और डाकिनी शाकिनी आदिकी बाधासे उत्पन्नहुए ज्वरोंको यह रस भक्षण करतेही नष्ट करदेता है ॥ २९-९२ ॥

बृहत्कस्तूरीभैरवरस ।

मृतं वङ्गं खर्परं च स्वर्णं कस्तूरितारकम् ।
एतेषां समभागेन कर्षमेकं पृथक् पृथक् ॥ ९३ ॥