भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 184

१९२ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

शुद्ध पारा, गन्धक, मैनसिल और शुद्ध वत्सनाभ इन चारोंको समान भाग लेकर बारीक पीसलेवे, फिर निर्गुण्डीके स्वरस और अदरखके स्वरसमें क्रमसे तीन तीन बार भावना देकर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इस रसकी एक गोली पानमें रखकर खानेसे प्रबलज्वर शीघ्र नष्ट होता है ॥ ८५ ॥

शीतभञ्जी रस ।

पारदं रसकं तालं तुत्थं टङ्कणगन्धकम् ।
सर्वमेतत्समं शुद्धं कारवेल्लरसैर्दिनम् ॥ ८६ ॥
मर्दयेत्तेन कल्केन ताम्रपात्रोदरं लिपेत् ।
अङ्गुल्यर्द्धार्द्धमानेन तत्पचेत्सिकताह्वये ॥ ८७ ॥
यन्त्रे यावत्स्फुटन्त्येव व्रीहयस्तस्य पृष्ठतः ।
ताम्रपात्रं समुद्धृत्य चूर्णयेन्मरिचैः समम् ॥ ८८ ॥
शीतभञ्जीरसो नाम द्विगुञ्जो वातिकज्वरे ॥
दातव्यः पर्णखण्डेन मुहूर्तान्नाशयेज्ज्वरम् ॥ ८९ ॥

“शुद्धताम्रं षट्तोलकं तेन निर्मितं ताम्रखल्लं प्रत्येकं तोलकमितेन पारदादिषड्द्रव्येण लिप्तमधोमुखं कृत्वा स्थाल्यां संस्थाप्य पात्रान्तरेणाच्छाद्य उपरि वालुकाभिः स्थालीं परिपूर्य, तदुपरि व्रीहीन् दत्त्वा चुल्ल्यां निवेश्य तावदग्निज्वाला दातव्या यावद् व्रीहयो न स्फुटन्ति, स्फुटितेषु तेषु व्रीहिषु रसः सिद्धो भवति । पश्चात् मरिचचूर्णं षट्तोलकं सर्वमेकीकृत्य चूर्णयित्वा अस्य द्विगुञ्जं पर्णखण्डेन सह भक्षयेदित्युपदेशः ॥ ”

प्रथम ६ तोले शुद्ध ताम्र लेकर उसका एक खरल बनावे, फिर पारा, खपरिया हरताल, तुतिया, सुहागा और गन्धक इन सबको एकएक तोला परिमाण लेकर करेलेके पत्तोंके रसमें एकदिन खरल करके कल्क बनालेवे। उस कल्कका उक्त ताँबेके खरलके आध २ अँगुल ऊँचा भीतर लेप करके उसे सुखालेवे। फिर उस खरलका नीचेको मुँह करके एक हाँडीमें रखकर उसके ऊपर


१ रसकम्-खर्परम् ।

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