भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १५३

दूसरी हाँडी ढकदेवे और सन्धिस्थानोंको बन्द करदेवे । पश्चात् उसको वालुकायन्त्रके द्वारा चूल्हेपर रखकर पकावे और उस यन्त्रके ऊपर कुछ धानके दाने रखदेवे और यन्त्रको तबतक अग्नि देवे; जबतक धानकी खीलें न होजाय । जब सब धान अच्छी तरहसे खिलजायँ तब रसको सिद्ध हुआ जानकर स्वाङ्गशीतल होनेपर ताम्रपात्रको निकालले और उसमेंसे ओषधिको छुड़ाकर उसको ६ तोले मिरचोंके साथ खूब बारीक खरलकरके एक शीशीमें भरकर रखदेवे । इस रसको दो रत्ती परिमाण पानमें रखकर सेवन करनेसे क्षणभरमें वातज्वर नष्ट होता है । इसको शीतभञ्जीरस कहते हैं ॥ ८६-८९ ॥

स्वल्पज्वरांकुशरस ।

रसस्य द्विगुणं गन्धं गन्धतुल्यं च टङ्कणम् ।
रसतुल्यं विषं योज्यं मरिचं पंचधा विषात् ॥ ३९० ॥
कट्फलं दन्तिबीजं च प्रत्येकं मरिचोन्मितम् ।
ज्वराङ्कुशो रसो नाम मर्दयेद्याममात्रकम् ॥
माषैकेन निहन्त्याशु ज्वरं जीर्णं त्रिदोषजम् ॥ ३९१ ॥

पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, सुहागा, २ भाग, शुद्ध विष १ भाग, मिरच ५ भाग, कायफल ५ भाग और दन्तीके बीज ५ भाग लेकर सबको जलके साथ एक प्रहरतक खरल करके एकएक माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको सेवन करनेसे जीर्णज्वर और सन्निपातज्वर शीघ्र दूर होता है । यह विरेचक औषध है ॥ ३९० ॥ ९१ ॥

द्वितीयज्वरांकुश ।

ताम्रतो द्विगुणं तालं मर्दयेत्सुषवीद्रवैः ।
प्रपुटेद् भूधरे शीते चक्रीक्षीरैर्विमर्दयेत् ॥ ९२ ॥
प्रपुटेद् भूधरे पश्चात् पंचगुञ्जामितं शुभम् ।
आर्द्रकस्य रसेनैव सर्वज्वरनिकृन्तनः ॥ ९३ ॥
ऐकाहिकं द्वयाहिकं च त्र्याहिकं च चतुर्थकम् ।
विषमं चापि शीताढ्यं ज्वरं हन्ति ज्वराङ्कुशः ॥ ९४ ॥

ताँबा १ भाग और, हरताल २ भाग लेकर दोनोंको करेलेके पत्तोंके रसमें खरल करके भूधर यन्त्रमें पुटपाक करे । शीतल होनेपर उनको निकालकर थूहरके दूधमें घोटकर फिर भूधर यन्त्रमें रखकर पुट देवे । पश्चात् इसको ५ रत्ती परिमाण अदरखके रसमें मिलाकर देनेसे ही सब प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं । यह

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