भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 186
१६४भैषज्यरत्नावली ।[ रस-

रस ऐकाहिक, द्वयाहिक, तिजारी, चौथिया विषमज्वर ओर शीतज्वरको दूर करता है ॥ ९२-९४ ॥

तृतीयज्वरांकुशरस ।

शुद्धसूतं विषं गन्धं धूर्त्तबीजं त्रिभिः समम् ।
चतुर्णी द्विगुणं व्योषं चूर्णं गुञ्जाद्वयं हितम् ।
जम्बीरस्य च मज्जाभिरार्द्रकस्य रसेषु तम् ॥ ९५ ॥
ज्वराङ्कुशो रसो नाम ज्वरान्सर्वान्विनाशयेत् ।
ऐकाहिकं द्वयाहिकं च त्र्याहिकं चातुराह्निकम् ।
विषमं च त्रिदोषोत्थं हन्ति सद्यो न संशयः ॥ ९६ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और शुद्ध मीठातेलिया ये प्रत्येक एक एक तोला, धतूरेके बीज ३ तोले और त्रिकुटा (सोंठ, मिरच, पीपल) चारों ओषधियोंसे दुगुना अर्थात् १२ तोले लेकर सबको एकत्र जलके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । फिर जम्बीरी नींबूके बीजोंकी मींग और अदरखके रसके साथ इस रसकी एक गोली पीसकर रोगीको सेवन करावे । यह ज्वरांकुशरस सर्व प्रकारके ज्वरोंको नाश करता है । इसके सेवनसे ऐकाहिक, द्वयाहिक, तिजारी, चौथियाज्वर, विषमज्वर और त्रिदोषजनितज्वर निस्सन्देह शीघ्र दूर होता है ॥ ९५ ॥ ९६ ॥

मध्यमज्वरांकुशरस ।

शुद्धसूतं तथा गन्धं कर्षमानं नयेद् बुधः ।
महौषधं टङ्कणं च हरतालं तथा विषम् ॥ ९७ ॥
रसाद्धं मर्दयेत्खल्ले भृङ्गराजरसेन तु ।
त्रिदिनं भावनां दत्त्वा चतुर्थे वटिकां ततः ॥ ९८ ॥
कुर्याच्चणकमात्रां च पिप्पलीमधुसंयुतः ।
मध्यज्वराङ्कुशो नाम विषमज्वरनाशनः ॥ ९९ ॥

शुद्धपारा और शुद्धगन्धककी कजली ४ तोले तथा सोंठ, सुहागा, हरताल और वत्सनाभ विष ये प्रत्येक पारेसे अर्द्धभाग अर्थात् एक एक तोला लेवे । सबको एकत्र खरल करके भाँगरेके रसके साथ तीन दिनतक खूब अच्छे प्रकारसे घोटे,


१ व्योषं-मिलितचतुर्णां द्विगुणम् । २ महौषधादीनां चतुर्णी प्रत्येकं रसार्द्धम् ।

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