भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५६ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-
स्वर्णमभ्रं गैरिकं च टङ्कणं रूप्यमेव च ।
सर्वाण्येतानि तुल्यानि चूर्णयित्वा विभावयेत् ॥ ६ ॥
जम्बीरतुलसीचित्रविजयातिन्तिडीरसैः ।
एभिर्दिनत्रयं रौद्रे निर्जने खल्लगह्वरे ॥ ७ ॥
चणमात्रां वटीं कृत्वा छायाशुष्कां तु कारयेत् ॥ ८ ॥
पारा, गन्धक, ताँबा, सिंगरफ, हरताल, लोहा, वङ्ग, स्वर्णमाक्षिक, खपरिया, मैनासिल, सुवर्ण, अभ्रक, गेरू, सुहागा और रूपाभस्म इन सबको समान भाग लेकर एकत्र खरल करलेवे। फिर उस चूर्णको खरलमें डालकर जम्बीरीनींबू, तुलसीके पत्ते, चीतेकी जड़, भाँग और इमलीके पत्ते इन प्रत्येकके रसमें क्रम क्रमसे तीन तीन दिनतक धूपमें एकान्तस्थानमें रखकर भावना देवे। फिर चनेके बराबर गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे ॥ ४०६-४०८ ॥
महाग्निजननी चैषा सर्वज्वरविनाशिनी ।
एकजं द्वन्द्वजं चैव चिरकालसमुद्भवम् ।
ऐकाहिकं द्वयाहिकं च त्रिदोषप्रभवं ज्वरम् ॥ ९ ॥
चातुर्थकं तथाऽत्युग्रं जलदोषसमुद्भवम् ।
सर्वान् ज्वरान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ४१० ॥
नातः परतरं किञ्चिज्ज्वरनाशाय भेषजम् ।
बृहज्ज्वराङ्कुशो नाम रसोऽयं मुनिभाषितः ॥ ११ ॥
ये गोलियाँ जठराग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाली और सम्पूर्ण ज्वरोंको विनाश करनेवाली हैं। एवं एकदोषज, द्विदोषज और चिरकालजनितज्वर, ऐकाहिक, द्वयाहिक, त्रिदोषज, अत्यन्त प्रबल चातुर्थिक ज्वर और जलदोषसे उत्पन्न हुआ ज्वर इत्यादि समस्त ज्वरोंको तत्काल नाश करदेता है; जैसे-सूर्य अन्धकारको क्षणभरमें विनाश करदेता है । ज्वरको नष्ट करनेके लिये इससे बढ़कर अन्य कोई औषध नहीं है, ऐसा मुनियोंने कहा है। इसको बृहज्ज्वरांकुश रस कहते हैं ॥ ४०९-४११ ॥
महाज्वरांकुश रस ।
पारदं हिङ्गुलं ताम्रं माक्षिकं तुत्थमेव च ।
वङ्गं मृतं च गन्धं च खर्परं च मनःशिला ॥ १२ ॥