भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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१६४ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

सिंगरफ, पारा, गन्धक तीनोंको समान भाग लेकर पीपलवृक्षकी जड, बेरीकी जड, कटेरी और मकोयके क्वाथमें तीन तीन दिनतक भावना देकर दो या तीन रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । उनमेंसे एकएक गोली रोगीको गायके दूधके साथ सेवन करावे । यह विश्वेश्वर रस रात्रिमें आनेवाले ज्वरको शीघ्र नष्ट करता है ॥५७॥५८॥

विक्रमकेसरीरस ।

शुल्बमेकं द्विधा तारं मर्दयेद्विधिवद्भिषक् ।
पश्चाद्द्विषं रसं गन्धं मेलयित्वा तु भावयेत् ॥ ५९ ॥
एकविंशतिवारांश्च लिम्पाकवल्कलद्रवैः ।
रसः सिद्धः प्रदातव्यो गुञ्जामात्रो ज्वरान्तकृत् ॥
सर्वज्वरहरः ख्यातो रसो विक्रमकेसरी ॥ ४६० ॥

ताम्रभस्म १ तोला और रौप्यभस्म २ तोले लेकर दोनोंको एकत्र खूब बारीक खरल करे । फिर उसमें शुद्ध वत्सनाभ, पारा और गन्धक ये प्रत्येक एकएक तोला मिलाकर कन्नानींबूके वृक्षकी छालके काढेमें २१ बार भावना देकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह रस सर्वप्रकारके ज्वरोंको नष्ट करनेके लिये प्रसिद्ध है ॥ ५९ ॥ ४६० ॥

ज्वरकालकेतुरस ।

रसं विषं गन्धकताम्रकंच मनःशिलारुष्करतालकं च ।
विमर्द्य वज्रीपयसा समांशं गजाह्वयं तत्र पुटं विदध्यात् ६१ ॥
द्विगुञ्जमस्यैव मधुप्रयुक्तं ज्वरं निहन्यष्टविधं महोग्रम् ।
पुरा भवान्यै कथितो भवेन नृणां हिताय ज्वरकालकेतुः ॥६२

पारा, विष, गन्धक, ताम्रभस्म, मैनासिल, भिलावे और हरताल इनको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके गजपुटमें पकावे । इस रसको दो दो रत्तीपरिमाण शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे अत्यन्त उग्र आठोंप्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं । इस रसको पूर्वकालमें मनुष्योंके हितके लिये शिवजी महाराजने पार्वतीजीसे कहा था ॥ ६१ ॥ ६२ ॥

त्रिपुरारिरस ।

हुताशमुखमंशुद्धं रसं ताम्रं च गन्धकम् ।
लौहमभ्रं विषं चैव सर्वं कुर्यात्समांशकम् ॥ ६३ ॥
रसाद्धं मृतरूप्यं च शृङ्गवेराम्बुमर्द्दितम् ।
द्विगुञ्जं मधुना देयं सितयाऽऽर्द्ररसेन वा ॥ ६४ ॥