भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 1416 में से

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १६५

ज्वरमष्टविधं हन्ति वारिदोषभवं तथा ॥ प्लीहानमुदरं शोथमतीसारं विनाशयेत् ॥ रोगानेतान्निहन्त्याशु शङ्करस्त्रिपुरं यथा ॥ ६५ ॥ सिंगरफसे निकालाहुआ शुद्ध पारा, ताम्रभस्म, गन्धक, लोहा, अभ्रक और शुद्ध मीठा तेलिया ये सब एक एक तोला और चाँदीकी भस्म ६ माशे लेकर सबको अदरखके रसमें घोटकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको शहद और अदरखके रसके साथ अथवा मिश्रीमें मिलाकर सेवन करना चाहिये । इसके सेवनसे आठों प्रकारका ज्वर, जलदोषसे उत्पन्न हुआ ज्वर, प्लीहा, उदररोग, शोथ, अतिसार आदि सब रोग दूर होते हैं ॥ ६३–६५ ॥

मेघनादरस ।

तारं कांस्यं मृतं ताम्रं त्रिभिस्तुल्यं च गन्धकम् । क्वाथेन मेघनादस्य पिष्ट्वा रुद्ध्वा पुटे पचेत् ॥ ६६ ॥ षड्भिः पुटैर्भवेत्सिद्धो मेघनादो ज्वरापहः । भक्षयेत्पर्णखण्डेन विषमज्वरनाशनः ॥ ६७ ॥ अस्य मात्रा द्विगुंजा स्यात्पथ्यं दुग्धौदनं हितम् । नागरातिविषामुस्ताभूनिम्बामृतवत्सकैः ॥ ६८ ॥ सर्वज्वरातिसारघ्नं क्वाथमस्यानुपाययेत् । तरुणं वा ज्वरं जीर्णं तृष्णां दाहं च नाशयेत् ॥ ६९ ॥ चाँदी काँसा ताँबा इन तीनोंकी भस्म एक एक तोला और गन्धक ३ तोले लेकर सबको एकत्र खरल करके चौलाईके शाकके रसमें बारम्बार खरल करके ६ बार गजपुटमें पकावे । इस प्रकारसे जब यह रस उत्तम प्रकारसे सिद्ध होजाय तब बारीक खरल करलेवे । इसको दो दो रत्तीकी मात्रासे पानके रस और मधुमें मिलाकर सेवन करे । यह विषमज्वरको नष्ट करता है । इसपर दूधभातका पथ्य हितकारी है । यह नवीनज्वर, जीर्णज्वर, तृष्णा और दाहको शान्त करता है । इस रसको सोंठ, अतीस, नागरमोथा, चिरायता, गिलोय और कुडेकी छाल इन ओषधियोंका क्वाथ अनुपानके साथ सेवन करानेसे सब प्रकारका ज्वरातिसाररोग दूर होता है ॥ ६६–६९ ॥

शीतारिरस ।

तालकं दरदोद्भूतं पारदं गन्धकं शिला । क्रमाद्भागाङ्घिरहितं कारवेल्लाम्बुमर्दितम् ॥ ४७० ॥

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