भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १७६
न देयः श्वासकासे च शूलयुक्तनरे तथा ।
गोपनीयः प्रयत्नेन न देयो यस्य कस्यचित् ॥ २७ ॥
इस औषधिको सेवन कराकर रोगीको आरामसे सुलाकर उसके: देहको गरम कपडेसे अच्छीतरह ढक देवे । इससे पसीना आतेही रोगी रोगमुक्त होजाता है । जागनेके पश्चात् रोगीको स्नान कराकर मिश्री मिलाहुआ दही भोजन करावे । यह कल्पतरु रस अत्यन्त दुर्लभ है । इसके सेवनसे असाध्य और चिरकालसे उत्पन्नहुआ जीर्णज्वर, विषमज्वर, ज्वरातिसार, संग्रहणी, पाण्डु और कामलारोग नष्ट होते हैं । इस रसको श्वास, कास और शूलरोगमें कदापि नहीं देना चाहिये ।; यह अत्यन्त गोपनीय है, इसलिये जिस तिसको नहीं देना चाहिय ॥ २४-२७ ॥
तालाङ्करस ।
तालकस्य च भागौ द्वौ भागं तुत्थस्य शुक्तिका ।
चूर्णकानां चतुर्भागं मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ २८ ॥
यामैकेन ततः पश्चाद्रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ।
अस्य गुञ्जाद्वयं हन्ति वातिकं पैत्तिकं तथा ।
शीतज्वरं विशेषेण तृतीयकचतुर्थकौ ॥ २९ ॥
हरताल २ भाग, तूतिया १ भाग और सीपीकी भस्म ४ भाग लेकर सबको घीग्वारके रसमें एक प्रहरतक खरल करके गोलासा बनाकर उसको शरावसम्पुटमें बन्द करके गजपुटमें पकावे । इस रसको दो दो रत्ती परिमाण सेवन करनेसे वातज, पित्तजज्वर, शीतज्वर और विशेषकर तृतीयक (तिजारी), चातुर्थिक (चौथिया) ज्वर दूर होता है ॥ २८-२९ ॥
पर्पटीरस ।
शुद्धसूतं द्विधा गन्धं मर्द्यं भृङ्गरसेन च ।
मृत ताम्रं लौहभस्म पादांशेन तयोः क्षिपेत् ॥ ५३० ॥
लौहपात्रे च विपचेच्चालयेल्लौहचाटुना ।
तत्क्षिपेत्कदलीपत्रे गोमयोपरि संस्थिते ॥ ३१ ॥
पश्चाच्च चूर्णयेत्खल्ले निर्गुण्ड्या भावयेद्दिनम् ।
जयन्तीत्रिफलाकन्यावासाभाङ्गींकटुत्रिकैः ॥ ३२ ॥