भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १७६ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस- |
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भृङ्गाग्निमूलमुण्डीभिर्भावयेद्दिनसप्तकम् ।
अङ्गारैः स्वेदयेत्किञ्चित् पर्पटाख्यो महारसः ॥ ३३ ॥
चतुर्गुञ्जामितो भक्ष्यः सम्यक् श्लेष्मज्वरं जयेत् ।
पथ्याशुण्ठ्यमृताक्वाथमनुपानं प्रयोजयेत् ॥ ३४ ॥
शोधित पारा १ भाग और शुद्ध गन्धक २ भाग लेकर दोनोंकी एकत्र कज्जली करके भाँगरेके रसमें खरल करे । फिर उसमें ताम्रभस्म और लोहभस्म कज्जलीसे चौथाई भाग मिलाकर लोहेके पात्रमें पकावे और लोहेकी करछीसे चलाताजावे । जब वह पिघलकर पतली होजाय तब गोबरके ऊपर एक केलेका पत्ता रखकर उसके ऊपर कज्जलीको ढाल देवे । जब वह पपड़ीकी समान जमजाय तब उसको खरलमें डालकर निर्गुण्डीके रसमें एक दिनतक भावना देवे । पश्चात् अरणी, त्रिफला, घीग्वार, अडूसा, भारंगी, त्रिकुटा, भाँगरा, चीतेकी जड और मुण्डी इन प्रत्येकके रस अथवा क्वाथमें सातदिनतक भावना देवे । फिर अँगारोंकी अग्निसे कुछ सेककर शीशीमें भरकर रखलेवे । इसको चार चार रत्ती परिमाण सेवन करना चाहिये और ऊपरसे हरड, साँठ, गिलोय इनके क्वाथका अनुपान करना चाहिये । यह पर्पटीरस श्लैष्मिकज्वरको नष्ट करनेके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ५३०-३४ ॥
त्रैलोक्यचिन्तामणिरस ।
भागत्रयं स्वर्णभस्म द्विभागं तारमभ्रकम् ।
लौहात्पंच प्रवालं च मौक्तिकं त्रयसम्मितम् ॥ ३५ ॥
भस्मसूतं सप्तकं च सर्वं मर्द्यं तु कन्यया ।
छायाशुष्का वटी कार्या च्छागीदुग्धानुपानतः ॥ ३६ ॥
क्षयं हन्ति तथा कासं गुल्मं चापि प्रमेहनुत् ।
जीर्णज्वरहरश्चायमुन्मादस्य निकृन्तनः ॥
सर्वरोगहरश्चापि वारिदोषनिवारणः ॥ ३७ ॥
सुवर्णभस्म ३ तोले, चाँदीकी भस्म २ तोले, अभ्रकभस्म २ तोले, लोहभस्म ५ तोले, प्रवालभस्म ३ तोले, मोतीका भस्म ३ तोले और रससिंदूर ७ तोले लेकर सबको एकत्र खरल करले फिर घीग्वारके रसमें एकदिनतक घोटकर छायामें सुखा करके एकएक रत्तीकी गालियाँ बनालेवे । फिर एकएक वटी नित्य बकरीके दूधके साथ सेवन करे । यह रस क्षयरोग, खाँसी, वातगुल्म, प्रमेह, जीर्णज्वर, उन्मादरोग