भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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१८८ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

वीर्य्यस्तम्भकरं चैव कामलापाण्डुरोगनुत् ।
सदा तु रमते नारीं न वीर्य्यं क्षयतां व्रजेत् ॥ १५ ॥
प्रमेहं विविधं चैव विविधां ग्रहणीं तथा ।
अनुपानविशेषेण सर्व्वव्याधिं विनाशयेत् ॥ १६ ॥

इसके सेवनसे अनेक प्रकारके ज्वर, शुक्रगतज्वर और बहुत पुराना ज्वर शीघ्र नष्ट होता है। इसको व्यवहार करनेपर वैद्यको रोगके साध्यासाध्यका विचार नहीं करना चाहिये। यह लोह धातुगत ज्वर, भूतवाधाजनित व अधिक परिश्रमसे उत्पन्नहुए ज्वर और सन्निपातजनित असाध्यज्वरको इस प्रकार शीघ्र नष्ट करता है, जैसे सूर्यका उदय अन्धकारको तत्काल दूर करदेता है। जैसे गरुडको देखकर सर्प तत्क्षण भाग जाता है, उसी प्रकार इस लोहके प्रभावसे ज्वर शीघ्र भाग जाते हैं। यह अत्यंत बलदायक, पुष्टिकारक, प्रबल मन्दाग्नि, कामला और पाण्डुरोगको दूर करता है एवं वीर्यको स्तम्भन करता है। इसका सेवन करनेवाला पुरुष यदि सर्वदा स्त्रियोंके साथ रमण करे तो भी उसका वीर्यक्षय नहीं होता। इसको अनुपान विशेषके साथ सेवन करनेसे विविधप्रकारके प्रमेह तथा अनेक प्रकारकी संग्रहणी और अन्यान्य सर्व प्रकारकी व्याधियाँ नष्ट होती हैं ॥ ११–१६ ॥

लोहासव ।

लौहचूर्णं त्रिकटुकं त्रिफलं च यमानिका ।
विडङ्गं मुस्तकं चित्रं चतुःसंख्यपलं क्षिपेत् ॥ १७ ॥
चूर्णीकृत्य ततः क्षौद्रं चतुःषष्टिपलं पृथक् ।
दद्याद्गुडतुलां तत्र जलद्रोणद्वयं तथा ॥ १८ ॥
घृतभाण्डे विनिक्षिप्य निदध्यान्मासमात्रकम् ।
लोहासवममुं मत्र्यः पिबेद्वह्निकरं परम् ॥ १९ ॥
पाण्डुश्वयथुगुल्मानि जठराण्यर्शासां रुजम् ।
ज्वरं जीर्णे च प्लीहानं कासं श्वासं भगन्दरम् ॥
अरोचकं च ग्रहणीं हृद्रोगं च विनाशयेत् ॥ ६२० ॥

लोहेकी भस्म, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, अजवायन, बाय-विडङ्ग, नागरमोथा और चीता ये प्रत्येक औषधि सोलह २ तोले लेकर