भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १९१
जिस स्नेहपाकमें कल्क और क्वाथका विधान नहीं किया गया हो, वहां स्नेह-विधिको जाननेवाले वैद्यको कल्क और क्वाथ दोनों लेने चाहिये । इस वाक्यके अनुसार घृतको कल्कके द्वारा सिद्ध करे । जहाँ जल, स्नेह और औषधियोंका प्रमाण नहीं कहा हो, वहाँ औषधियोंसे स्नेहपदार्थ चौगुना और स्नेहपदार्थसे चौगुना जल लेना चाहिये और जहाँपर किसी द्रवपदार्थ ( दूध, दही, काँजी और क्वाथ ( का उल्लेख नहीं किया हो, वहाँ सब जगह जल लेना चाहिये ॥ ९-११ ॥
क्षीरषट्पलकघृत ।
पञ्चकोलैः ससिन्धूत्थैः पलिकैः पयसा समम् ।
सर्पिःप्रस्थं शृतं प्लीहविषमज्वरगुल्मनुत् ॥ १२ ॥
पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ और सेंधानमक ये प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर इनका कल्क और क्वाथ बनाकर उस क्वाथ और कल्कके-साथ १ प्रस्थ घी और उसके समान दूध लेकर सबको एकत्र मिला उत्तम प्रकारसे घृतको सिद्ध करे । यह घृत प्लीहा, विषमज्वर और गुल्मरोगको नष्ट करता है ॥ १२ ॥
यत्र द्रवान्तरेऽनुक्ते क्षीरमेव चतुर्गुणम् ।
द्रवान्तरेण योगे हि क्षीरं स्नेहसमं भवेत् ॥ १३ ॥
स्नेहशब्दमें जहाँ किसी द्रवपदार्थका विधान नहीं किया हो, वहाँ चौगुना दूध लेना चाहिये । यदि स्नेहपाकमें किसी द्रव्यपदार्थका विधान हो तो स्नेहके समान भाग दूध डालकर पाक करना चाहिये ॥ १३ ॥
दशमूलषट्पलकघृत ।
दशमूलीरसे सर्पिः सक्षीरे पंचकोलकैः ।
सक्षारैर्हन्ति तत् सिद्धं ज्वरकासाग्निमन्दताम् ॥
वातपित्तकफव्याधीन् प्लीहानं चापि पाण्डुताम् ॥ १४ ॥
चार प्रस्थ दशमूलके क्वाथ और १ प्रस्थ दूधके साथ पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ और जवाखार प्रत्येकका कल्क चार चार तोले डालकर यथाविधि एक प्रस्थ घृतको सिद्ध करे । यह घृत ज्वर, खाँसी, मन्दाग्नि, त्रिदोषजनित रोग, प्लीहा और पाण्डूरोगको नष्ट करता है ॥ १४ ॥