भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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१९२भैषज्यरत्नावली ।[ तैल -

वासाद्यघृत ।

वासां गुडूचीं त्रिफलां त्रायमाणां यवासकम् ।
पक्त्वा तेन कषायेण पयसा द्विगुणेन च ॥ १५ ॥
पिप्पलीमूलमृद्वीकाचन्दनोत्पलनागरैः ।
कल्कीकृतैश्च विपचेद् घृतं जीर्णज्वरापहम् ॥ १६ ॥

अडूसा, गिलोय, हरड, आमला, बहेडा, त्रायमाण और जवासा यह सब औषधि समान भाग और सब मिलीहुई १ प्रस्थ लेकर ८ प्रस्थ जलमें क्वाथ बनावे आर २ प्रस्थ जल शेष रहनेपर उसमें ४ प्रस्थ दूध तथा पीपलामूल, दाख, लाल-चन्दन, नीलकमल और सोंठ इन सबका दो दो तोले कल्क डालकर उत्तम प्रकारसे घृतको सिद्ध करे । इस घृतको सेवन करनेसे जीर्णज्वर शीघ्र दूर होता है ॥ १५ ॥ १६ ॥

गुडूच्यादिघृत ।

गुडूच्याः क्वाथकल्काभ्यां त्रिफलाया वृषस्य च ।
मृद्वीकाया बलायाश्च सिद्धाः स्नेहा ज्वरच्छिदः ॥ १७ ॥

गिलोय, त्रिफला, अडूसा, दाख और खिरैंटी इन पाँचों औषधियोंके क्वाथ और कल्कके द्वारा पृथक् २ सिद्ध किये हुए पाँच प्रकारके घृत ज्वरनाशक हैं ॥ १७ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां घृतप्रकरणम् ।


अथ तैलप्रकरणम् ।

अभ्यङ्गांश्च प्रदेहांश्च सस्नेहान् सावगाहनान् ।
विभज्य शीतोष्णकृतान् दद्याज्जीर्णज्वरे भिषक् ॥ १ ॥
तैराशु प्रशमं याति बहिर्मार्गगतो ज्वरः ।
लभन्ते सुखमङ्गानि बलं वर्णश्च जायते ॥ २ ॥

वैद्य जीर्णज्वरमें तैलादिकी मालिश, प्रलेप, स्नेहपान और स्नेहादि पदार्थोंमें अवगाहन आदि क्रियाओंको शीत और उष्णताका विभाग करके अर्थात् उष्ण प्रधानज्वरमें शीत तैलादिका और शीतप्रधानज्वरमें उष्ण तैलादिका प्रयोग करे । इन सब क्रियाओंके द्वारा शरीरके बाहिरीभागमें स्थित ज्वर नष्ट होता है और शरीरमें स्वस्थता एवं बल, वर्णकी वृद्धि होती है ॥ १ ॥ २ ॥

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