भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 228
१९६ ]भैषज्यरत्नावली ।[ तैल-

गुडूची पृश्निपर्णी च बृहती दन्तिचित्रकौ ।
दार्वी हरिद्रा वृक्षाम्लं पर्पटं गजपिप्पली ॥ १९ ॥
एतेषां कार्षिकैः कल्कैस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
दधिकाञ्जिकतक्रैश्च मातुलुंगर सैस्तथा ॥ २० ॥
स्नेहमात्रासमैरेभिः शनैमृद्वग्निना पचेत ।
सिद्धमेतत् प्रयोक्तव्यं जीर्णज्वरमपोहति ॥ २१ ॥
एकजं द्वन्द्वजं चैव दोषत्रयसमुद्भवम् ।
सन्ततं सततान्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् ॥ २२ ॥
मासजं पक्षजं चैव चिरकालानुबन्धनम्
सर्वांस्तान्नाशयत्याशु पिप्पल्याद्यमिदं शुभम् ॥ २३ ॥

पीपल, नागरमोथा, धनियां, सेंधानमक, हरड, आमला, बहेडा, वच, अजवायन, अजमोद, लालचन्दन, पुहकरमूल, कचूर, दाख, इन्द्रायनकी जड़, शालपर्णी, गोखरू, चिरायता, नीमके पत्ते, बकायनकी छाल, कटेरी, गिलोय, पृश्निपर्णी, बड़ीकटेरी दन्तीकी जड़, चीतेकी जड़, दारुहल्दी, हल्दी, अम्लवेत, पित्तपापडा और गजपीपल इन प्रत्येक औषधिका कल्क एक एक कर्ष, तिलका तैल एक प्रस्थ एवं दहीका तोड़, कांजी, मट्ठा और बिजौरैनींबूका रस ये प्रत्येक एक एक प्रस्थ लेवे । सबको एकत्र मिलाकर मन्दमन्द अग्निसे शनैः शनैः तेलको सिद्ध करे । इस तेलकी मालिश करनेसे जीर्णज्वर दूर होता है । यह पिप्पल्यादि तैल एकदोषज, द्विदोषज, त्रिदोषजज्वर, द्वयाहिक, तृतीयक ( तिजारी ), चातुर्थिक ( चौथिया ), मासिक, पाक्षिक, सन्तत-ज्वर, सततज्वर और बहुत पुरानेज्वर इन सबको तत्काल नष्ट करता है ॥ १७-२३ ॥

किरातादितैल ।

मूर्वा लाक्षा हरिद्रे द्वे मञ्जिष्ठा सेन्द्रवारुणी ।
ह्रीबेरं पुष्करं रास्ना कपिवल्ली वटुत्रयम् ॥ २४ ॥
पाठा चेन्द्रयवैश्चैव लवणत्रयसंयुतम् ।
वासकार्क श्यामदारु महाकालफलं तथा ॥ २५ ॥
दधिमस्त्वारनालेन कैरातेन च संपचेत् ।
प्रस्थंप्रस्थं समादाय तैलप्रस्थे विपाचयेत् ॥ २६ ॥