भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 227

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १९५


सज्जी, सोंठ, कूठ, मूर्वा, लाख, हल्दी, मंजीठ और मुलहठी इन सबको मिला हुआ कल्क १ प्रस्थ, तिलका तेल २ प्रस्थ, कट्त्वरतक्र १२ प्रस्थ इन सबको एकत्र मिलाकर विधिपूर्वक तेलको सिद्ध करे। इस तेलकी मालिश करनेसे शीत और दाह सहित ज्वर नष्ट होता है ॥ १४ ॥

महाषट्कट्वरतैल ।

शुक्तारनालैर्दधिमस्तुतकैः फलाम्बुभागेन समं हि तैलम् ।
कृष्णादिकल्कैर्मृदुवह्निसिद्धमभ्यञ्जनं वातकफज्वराणाम् ॥ १५ ॥
ऐकाहिकद्वित्रिचतुर्थकानां मासार्द्धमासद्वयमासिकानाम् ।
निवारणं तद्विषमज्वराणां तैलं तु षट्कट्त्वरकं महत्स्यात् ॥

सिरका, काँजी, दहीका तोड़, तक्र और जम्बीरीनींबूका रस ये प्रत्येक चार २ प्रस्थ और तिलका तैल भी चार प्रस्थलेवे। एवं कल्कके लिये निम्नलिखित कृष्णादि-गणकी औषधियाँ लेवे । सबको एकत्र मिलाकर मन्दमन्द अग्निसे तैलको सिद्ध करे। यह महाषट्कट्त्वरतैल शरीरपर मालिश करनेसे वात-कफ-जन्यज्वर, ऐकाहिक, द्वयाहिक, तृतीयक, चातुर्थिक, पाक्षिक, मासिक, द्विमासिक और सब प्रकारके विषमज्वरोंको शीघ्र निवारण करताहै ॥ १५ ॥ १६ ॥

बृहत् पिप्पल्यादितैल ।

पिप्पली मुस्तकं धान्यं सैन्धवं त्रिफला वचा ।
यमानी चाजमोदा च चन्दनं पुष्कराह्वयम् ॥ १७ ॥
शठी द्राक्षा गवाक्षी च शालपर्णी त्रिकण्टकम् ।
भूनिम्ब्वारिष्टपत्राणि महानिम्बं निदिग्धिका ॥ १८ ॥


१ कृष्णा चित्रकषड्ग्रन्था वासकं विकसा घनम् ।
ग्रन्थिकैले चातिविषा रेणुकं च कटुत्रयम् ॥
यमानी गोस्तनी व्याघ्री भूनिम्बं बिल्वचन्दनम् ।
भाङ्गी श्यामा शिवा धात्री स्थिरा मूर्वा सजीरका ॥
सर्षपं हिङ्गु कटुकी विडंगं च समांशकम् ।
एष कृष्णादिको नाम गणो ज्वरविनाशनः ॥

पीपल, चीतेकी जड, वच, अडूसा, मञ्जीठ, नागरमोथा, पीपलामूल, इलायची, अतीस, रेणुका, सोंठ, पीपल, मिरच, अजवायन, दाख, कटेरी, चिरायता, बेलकी छाल लालचन्दन, भारंगी, अनन्तमूल, हरड, आमला श्यामपर्णी, मूर्वा, जीरा, सरसों, हींग, कुटकी और वायविडंग इन सब औषधियोंके समानभाग मिश्रित समुदायको कृष्णादिगण कहते हैं। यह गण सर्व प्रकारके ज्वरोंको नष्ट करनेवालाहै ॥