भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २०४ | भैषज्यरत्नावली । | [ दुग्ध- |
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जीर्णज्वरमें रोगीके शिरमें भारीपन और पीडा हो एवं समस्त इन्द्रियोंमें शिथिलता हो तो कोई उत्तम नस्य प्रयोग करना चाहिये । इससे कफके निकल जानेपर शिरकी पीडा दूर होजाती है ॥ ६३ ॥
ज्वरमें शिरपीडानिवारक लेप ।
रक्तकरवीरपुष्पं धात्रीफलं सधान्याम्लम् ।
कल्कः सुखोष्णलेपाज्ज्वरेषु शिरसो रुजं जयति ॥ ६४ ॥
लालकनेरके फूल और आमले इन दोनोंको समान भाग लेकर काँजीके साथ पीसकर आर कुछ गरम करके सुहाता २ शिरपर लेप करनेसे ज्वरमें उत्पन्न हुई शिरकी पीडा नष्ट होती है ॥ ६४ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां तैलप्रकरणम् ॥
अथ दुग्धप्रकरणम्।
जीर्णज्वरे कफे क्षीणे क्षीरं स्यादमृतोपमम् ।
तदेव तरुणे पीतं विषवद्धन्ति मानवम् ॥ १ ॥
चतुर्गुणेनाम्भसा च शृतं ज्वरहरं पयः ।
धारोष्णं वा पयः शीतं पीतं सद्यो ज्वरं जयेत् ॥ २ ॥
जीर्णज्वरमें कफके क्षीण होजानेपर दुग्ध पान करनेसे वह अमृतके समान गुण करता है । किन्तु नवीनज्वरमें पान कियाहुआ दुग्ध मनुष्यको विषके समान नष्ट कर देताहै । चौगुने जलके साथ दूधको पकाकर जब केवल दूधमात्र शेष रहजाय तब उतारकर उसको पान करनेसे अथवा धारोष्ण ( तत्कालका दुहा हुआ ) या पकाकर शीतल कियाहुआ पीनेसे ज्वर शान्त होता है । इस प्रकार पिया हुआ दूध ज्वरमें हितकारी है ॥ १ ॥ २ ॥
जीर्णज्वराणां सर्वेषां पयः प्रशमनं परम् ।
पेयं तदुष्णं शीतं वा यथास्वमौषधैः शृतम् ॥ ३ ॥
सब प्रकारके जीर्णज्वरोंमें ज्वरनाशक औषधियोंके साथ पकायाहुआ दूध गरम अथवा शीतल करके रोगीको इच्छानुसार पान कराना चाहिये । इससे ज्वर शमम होता है ॥ ३ ॥