भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २०५


कासाच्छ्वासाच्छिरःशूलात्पार्श्वशूलाच्चिरज्वरात् ।
मुच्यते ज्वरितः पीत्वा पञ्चमूलीशृतं पयः ॥ ४ ॥
लघुपंचमूलकी औषधियोंके द्वारा दूधको सिद्ध करके पीनेसे खाँसी, श्वास, शिरःशूल, पार्श्वशूल और बहुत पुराने दिनोंका ज्वर नष्ट होता है ॥ ४ ॥

क्षीरपाकविधि।
द्रव्यादष्टगुणं क्षीरं क्षीरात्तोयं चतुर्गुणम् ।
क्षीरावशेषः कर्तव्यः क्षीरपाके त्वयं विधिः ॥ ५ ॥
क्षीरपाककी विधि यह है कि, जिस औषधिके साथ दुग्धपाक करना हो तो उस औषधिसे अठगुना दूध और दूधसे चौगुना जल लेकर सबको एकत्र कर पकावे । जब पककर दूधमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे ॥ ५ ॥

त्रिकण्टकबलाव्याघ्रीगुडनागरसाधितम् ।
वर्चोमूत्रविबन्धघ्नं शोथज्वरहरं पयः ॥ ६ ॥
गोखरू, खिरेंटी, कटेरी और सोंठ इन औषधियोंके द्वारा यथाविधि सिद्ध कियेहुए दूधमें गुड डालकर पान करनेसे मल-मूत्रका अवरोध और सूजनसहित ज्वर दूर होता है ॥ ६ ॥

वृश्चीरबिल्ववर्षाभूः पयश्चोदकमेव च ।
पचेत्क्षीरावशिष्टं तु तद्धि सर्वज्वरापहम् ॥ ७ ॥
सफेद पुनर्नवा, बेलकी छाल और लालपुनर्नवा ये सब औषधि समान भाग और सब मिलाकर दो तोले, दूध १६ तोले और जल ६४ तोले लेकर सबको एकत्रकर पकावे । जब पककर दूधमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । इस दूधको पान करनेसे सर्वप्रकारके ज्वर शमन होते हैं ॥ ७ ॥

शीतं वोष्णं ज्वरे क्षीरं यथास्वमौषधैः शृतम् ।
एरण्डमूलसिद्धं वा ज्वरे सपरिकर्तिके ॥ ८ ॥
पित्तज्वरमें और वातपित्तज्वरमें शीतल दुग्ध तथा वातज्वर और वातकफज्वरमें उष्ण दुग्ध वातनाशक औषधियोंके साथ पकाकर सेवन कराना चाहिये । एवं ज्वररोगीके गुदामें कतरनेकी समान पीडा होनेपर अण्डकी जडके साथ सिद्ध कियाहुआ दुग्ध पान कराना चाहिये ॥ ८ ॥

नासाज्वरमें आहवारि रस
क्षुद्रैला साभया कृष्णा लौहाभ्रखर्पराणि च ।
समभागं प्रकर्तव्यं द्विभागः पारदो मतः ॥ ९ ॥