भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०६ | भैषज्यरत्नावली | [ दुग्ध-
सर्वमेकत्र सम्मर्द्य द्रोणपुष्परसेन च ।
वल्लमात्रं प्रदातव्यं पुनर्नवरसैर्युतम् ॥ १० ॥
छोटी इलायची, हरड, पीपल, लोहा, अभ्रक और खपरिया ये प्रत्येक एक एक तोला और पारा दो तोले लेवे। सबको एकत्र द्रोणपुष्पीके रसमें खरल करके दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे इनमेंसे एक एक गोली पुनर्नवेके रसके साथ सेवन करावे ॥ ९ ॥ १० ॥
प्लीहानं यकृतं शोथमग्निमान्द्यमरोचकम् ।
नासाज्वरं विशेषेण सर्वं च विषमज्वरम् ॥
आह्ववारिरसो ह्येष नाशयेद्विकल्पतः ॥ ११ ॥
यह आह्ववारि नामक रस—प्लीहा, यकृत, शोथ, अग्निकी मंदता, अरुचि, नासा-ज्वर और विशेषकर सब प्रकारके विषमज्वरोंको निस्सन्देह नष्ट करता है ॥ ११ ॥
गन्धककज्जलीविधि ।
कण्टकारी सिन्धुवारस्तथा पूतिकरञ्जकम् ।
एतेषां रसमादाय कृत्वा खर्परखण्डके ॥ १२ ॥
प्रक्षेप्यं गन्धकं तत्र ज्वालां मृद्वग्निना दहेत् ।
गन्धके स्नेहमापन्ने तत्समं पारदं क्षिपेत् ॥ १३ ॥
मिश्रीकृत्य ततो द्वाभ्यां द्रुतं तमवतारयेत् ।
आमर्दयेत्तथां तत्त यथा स्यात्कज्जलप्रभम् ॥ १४ ॥
कटेरी, सिम्हालू और दुर्गन्धकरञ्ज इनके स्वरसको समान भाग लेकर एक मिट्टीके नवीन पात्र (खीपडे) में रखकर उसमें गन्धकको डाल मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब गन्धक अच्छे प्रकारसे पिघलजाय तब उसमें गन्धकके समान भाग पारा डालदेवे फिर जब दोनों मिलकर एकमएक होजायं तब चूल्हेपरसे शीघ्र उतारकर लोहेके दण्डेसे खूब खरल करके कज्जलीसमान बनालेवें ॥ १२–१४ ॥
ततस्तु रक्तिकामस्य माषैकं जीरकस्य च ।
माषैकं लवणस्यापि पर्णे कृत्वा निधापयेत् ॥ १५ ॥
ज्वरे त्रिदोषजे घोरे जलमुष्णं पिबेदनु ।
छर्द्यां शर्करया दद्यात् सामे दद्यात्तथा गुडम् ॥ १६ ॥