भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 244
२१२भैषज्यरत्नावली ।[ ज्वरातिसार-

त्यागदेवे । एवं परिश्रम, स्त्रीप्रसंग, स्नान और भ्रमणादिकमोंको ज्वररोगी जबतक अच्छे प्रकारसे बलवान् न होजाय तबतक कदापि न करे ॥ ८-११ ॥

आरोग्यस्नानकाल ।

धनिष्ठा श्रवणा स्वाती ज्येष्ठा शतभिषा तथा ।
रविमन्दभौमवाराश्चन्द्रोऽशुभविवर्जितः ॥ १२ ॥
केन्द्रस्थाश्चाशुभाः शस्ता व्यतीपातादिवासराः ।
तिथिर्न शस्ता प्रतिपत्तृतीया नवमी तथा ॥ १३ ॥
स्नानाय रोगमुक्तानां दशमी च त्रयोदशी ।
बुधेन्दुगुरुशुक्राणां वाराः स्नाने न शोभनाः ॥
रोगान्मुक्तस्य नाश्लेषा रोहिणी भद्रदायिनी ॥ १४ ॥

धनिष्ठा, श्रवण, स्वाती, ज्येष्ठा और शतभिषा इन नक्षत्रों एवं रविवार, शनिवार और मंगलवारोंमें यदि चन्द्रमा शुभ हो और केन्द्रस्थानमें न गया हो तो रोगीको रोगमुक्त होनेपर आरोग्यस्नान कराना चाहिये । इसमें व्यतीपातादिके दिनभी श्रेष्ठ मानेगये हैं। प्रतिपदा, तृतीया, नवमी, दशमी और त्रयोदशी इन तिथियों तथा बुध, सोम, बृहस्पति और शुक्र इन वारोंको रोगसे मुक्त हुए रोगीको स्नान करानेके लिये त्यागदेवे । एवं आश्लेषा रोहिणी और भद्रायुक्त तिथि भी आरोग्यस्नान करनेवाले रोगीके लिये वर्जित हैं ॥ १२-१४ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां ज्वरचिकित्सा ।


अथ ज्वरातिसार-चिकित्सा ।

पित्तज्वरे पित्तभवोऽतिसार-
स्तथाऽतिसारे यदि वा ज्वरः स्यात् ।
दोषस्य दूष्यस्य समानभावाद्
ज्वरातिसारः कथितो भिषग्भिः ॥ १ ॥

यदि पैत्तिकज्वरमें पित्तकी गरमीके कारण अतिसार (दस्त) हों अथवा अतिसाररोगमें ज्वर होजाय तो दोष और दूष्यकी समानता होनेके कारण इससे मिलित रोगको वैद्यलोग ज्वरातिसार कहते हैं ॥ १ ॥