भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २१३


ज्वरातिसारयोरुक्तं भेषजं यत् पृथक् पृथक् ।
न तन्मिलितयोः कुर्यादन्योन्यं वर्द्धयेद्यतः ॥ २ ॥
प्रायो ज्वरहरं भेदि स्तम्भनं त्वतिसारनुत् ।
अतोऽन्योन्यविरुद्धत्वाद्धर्द्धनं तत्परस्परम् ॥
ततस्तौ प्रतिकुर्वीत विशेषोक्तैश्चिकित्सितैः ॥ ३ ॥

ज्वर और अतिसार रोगमें जो जो पृथक् पृथक् औषधियाँ कही हैं, ज्वरातिसार-रोगमें वे औषधियाँ मिलाकर नहीं देना चाहिये । कारण—वे आपसमें विरोधी हैं अर्थात् ज्वरनाशक औषधियाँ प्रायः भेदक होती हैं और अतिसारनाशक औषधियाँ प्रायः मलस्तम्भक होती हैं । इसलिये दोनों प्रकारकी औषधियाँ परस्पर विरुद्ध गुणोंवाली होनेसे एक दूसरे रोगोंको बढाती हैं । अतएव ज्वरातिसाररोगमें उक्त दोनों प्रकारकी औषधियोंका प्रतिकार कर जो विशेष चिकित्सा कही है, उसीके अनुसार वैद्योंको चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २ ॥ ३ ॥

ज्वरातिसारिणामादौ कुर्याल्लङ्घनपाचने ।
प्रायस्तावामसम्बन्धं विना न भवतो यतः ॥ ४ ॥
ज्वरातिसारे पेयादिक्रमः स्याल्लङ्घिते हितः ।
ज्वरातिसारी पेयां वा पिबेत्साम्लां शृतां नरः ॥ ५ ॥

ज्वरातिसारके रोगीको पहिले लंघन करावे फिर पाचक औषधि देवे । कारण दोनों रोग प्रायः आम रसके बिना उत्पन्न नहीं होते हैं । ज्वरातिसारमें लंघन करानेके बाद पेयादि देना हितकर है । इसमें रोगीको अनार आदि खट्टे रसवाले पदार्थोंके रसके द्वारा पेया बनाकर पान कराना चाहिये ॥ ४ ॥ ५ ॥

ह्रीबेरादि ।

ह्रीबेरातिविषामुस्तबिल्वनागरधान्यकैः ।
पिबेत् पिच्छाविबन्धघ्नं शूलदोषामपाचनम् ॥
सरक्तं हन्त्यतीसारं सज्वरं वाथ विज्वरम् ॥ ६ ॥

सुगन्धवाला, अतीस, नागरमोथा, बेलकी जड, सोंठ और धनियाँ इनका क्वाथ सेवन करनेसे मलकी पिच्छिलता, विबन्ध और शूल नष्ट होते हैं तथा आमदोषका परिपाक होकर रक्तातिसार, ज्वरातिसार अथवा केवल अतिसार रोग दूर होताहै ॥ ६ ॥