भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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२१४ भैषज्यरत्नावली । [ ज्वरातिसार-

पाठादि । पाठामृता पर्पटमुस्तविश्वकिराततिक्तेन्द्रयवान् विपच्य ।
पिबन् हरत्येव हरेत सर्वान् ज्वरातिसारानपि दुर्निवारान् ॥७॥
पाठ, गिलोय, पित्तपापडा, नागरमोथा, सोंठ, चिरायता और इन्द्रजौ इनका यथाविधि क्वाथ बनाकर पान करनेसे तत्काल ही दुस्तर ज्वरातिसार नष्ट होते हैं ॥७॥

नागरादि । नागरातिविषा मुस्तभूनिम्बामृतवत्सकैः ।
सर्वज्वरहरः क्वाथः सर्वातीसारनाशनः ॥ ८ ॥
सोंठ, अतीस, नागरमोथा, चिरायता, गिलोय और कुडेकी छाल इनका क्वाथ सर्वप्रकारके अतिसारको नष्ट करताहै ॥ ८ ॥

उशीरादि । उशीरं बालकं मुस्तं धन्याकं विश्वभेषजम् ।
समङ्गा धातकी लोध्रं बिल्वं दीपनपाचनम् ॥ ९ ॥
हन्त्यरोचकपिच्छामविबन्धं सातिवेदनम् ।
सशोणितमतीसारं सज्वरं वाऽथ विज्वरम् ॥ १० ॥
खस, सुगन्धवाला, नागरमोथा, धनियां, सोंठ, वाराहक्रान्ता, ( लज्जाव
धायके फूल, लोध और बेलकी गिरी इनका क्वाथ दीपन और पाचन है। इस क्वाथको पान करनेसे अरुचि, पिच्छिलता, मलबद्धता, पीडासहित रक्तातिसार, ज्वररहित या ज्वरसहित अतिसार दूर होता है ॥ ९ ॥ १० ॥

शुण्ठीदशमूल । दशमूलीकषायेण विश्वमक्षसमं पिबेत् ।
ज्वरे चैवातिसारे च सशोथे ग्रहणीगदे ॥ ११ ॥
अतिसार और शोथयुक्त संग्रहणीरोगमें दशमूलके क्वाथमें थोडा सोंठका चूर्ण डालकर पान करनेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ११ ॥

गुडूच्यादि । गुडूच्यतिविषाधान्यशुण्ठीबिल्वाब्दबालकैः ।
पाठाभूनिम्बकुटजचन्दनोशीरपद्मकैः ॥ १२ ॥
कषायः शीतलः पेयो ज्वरातीसारशान्तये ।
हल्लासारोचकच्छर्द्दिपिपासादाहशान्तिकृत् ॥ १३ ॥