भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषार्टीकासहिता । २१७
चिरायता, बेलकी गिरी, सुगन्धवाला, गिलोय, नागरमोथा और इन्द्रजौ इनका क्वाथ पाचक और शोथ तथा ज्वरातिसारको दूर करनेवाला है ॥ २४ ॥
कणादि।
कणाकरिकणालाजक्वाथो मधुसितायुतः । पीतो ज्वरातिसारस्य तृष्णामाशु विनाशयेत् ॥ २५ ॥
पीपल, गजपीपल और खीलें इनका क्वाथ बनाकर शीतल करके उसमें शहद और मिश्री डालकर पीनेसे ज्वरातिसाररोगीकी तृषा शमन होती है ॥ २५ ॥
पञ्चमूल्यादि ।
पञ्चमूलीबलाबिल्वगुडूचीमुस्तनागरैः । पाठाभूनिम्बह्रीबेरकुटजत्वक्फलैः शृतम् ॥ २६ ॥ हन्ति सर्वानतीसारान् ज्वरदोषं वमिं तथा । सशूलोपद्रवं कासं श्वासं हन्यात्सुदारुणम् ॥ २७ ॥ पञ्चमूली तु सामान्या योज्या पैत्ते कनीयसी । महती पञ्चमूली तु वातश्लेष्मातुरे हिता ॥ २८ ॥
शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बडी कटेरी, कटेरी, गोखरू, खिरेंटी, बेलकी गिरी, गिलोय, नागरमोथा, सोंठ, पाठ, चिरायता, सुगन्धवाला, कुडेकी छाल और इन्द्रजौ इन औषधियोंका यथाविधि क्वाथ बनाकर पान करनेसे समस्त अतिसार, ज्वर, वमन, शूल आदि उपद्रवासहित खाँसी और दारुण श्वासरोग शमन होता है। पित्तकी अधिकता होनेपर इसमें लघुपंचमूल और वाताधिक्यमें बृहत्पञ्चमूलका क्वाथ हितकर है ॥ २६-२८ ॥
बृहत्पञ्चमूल्यादि ।
पञ्चमूली शृङ्गवेरशृङ्गाटकञ्चटं घनम् । जम्बूदाडिमपत्रं च बला बालं गुडूचिका ॥ २९ ॥ पाठा बिल्वं समंगा च कुटजत्वक्फलं तथा । धान्यकं धातकीक्वाथं विषाजीरकसंयुतम् ॥ ३० ॥ पिबेद् ज्वरातिसारे च सरक्ते वाप्यरक्तके । अपि योगशतैस्त्यक्ते चासाध्ये सर्वरूपके ॥ ३१ ॥
बेलकी गिरी, स्योनापाठा, कुंमेर, पाढल, अरणी, सोंठ, सिंघाडेके पत्ते, जलचौलाई, नागरमोथा, जामुनके पत्ते, खिरेंटी, सुगन्धवाला, गिलोय, पाठ, बेल, वारा-